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Dipendra Singh 'Raaz'
sabab tanhaaii ka hai vo meri kahti thii mujhko jo
sabab tanhaaii ka hai vo meri kahti thii mujhko jo | सबब तन्हाई का है वो मेरी कहती थी मुझको जो
- Dipendra Singh 'Raaz'
सबब
तन्हाई
का
है
वो
मेरी
कहती
थी
मुझको
जो
किसी
भी
हाल
में
तुमको
कभी
तन्हा
न
छोडूंँगी
- Dipendra Singh 'Raaz'
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पहले
तो
वो
हाथ
पकड़कर
कमरे
से
बाहर
लाया
और
फिर
मुझको
इस
दुनिया
में
यार
अकेला
छोड़
गया
Tanoj Dadhich
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उम्र
शायद
न
करे
आज
वफ़ा
काटना
है
शब-ए-तन्हाई
का
Altaf Hussain Hali
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यदि
अंधकार
से
लड़ने
का
संकल्प
कोई
कर
लेता
है
तो
एक
अकेला
जुगनू
भी
सब
अन्धकार
हर
लेता
है
Balkavi Bairagi
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मैं
अपने
चारों
तरफ़
हूँ
और
इस
तरह
का
हुजूम
अजीब
किस्म
की
तन्हाई
साथ
लाता
है
Abhishek shukla
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ज़रा
देर
बैठे
थे
तन्हाई
में
तिरी
याद
आँखें
दुखाने
लगी
Adil Mansuri
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तमाम
नाख़ुदा
साहिल
से
दूर
हो
जाएँ
समुंदरों
से
अकेले
में
बात
करनी
है
Tehzeeb Hafi
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हम
कुछ
ऐसे
उसके
आगे
अपनी
वफ़ा
रख
देते
हैं
बच्चे
जैसे
रेल
की
पटरी
पर
सिक्का
रख
देते
हैं
तस्वीर-ए-ग़म,
दिल
के
आँसू,
रंजो-नदामत,
तन्हाई
उसको
ख़त
लिखते
हैं
ख़त
में
हम
क्या
क्या
रख
देते
हैं
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Subhan Asad
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अधूरे
शे'र
के
मिसरों
को
देखा
तो
किसे
कहते
हैं
तन्हाई
समझ
आई
Sunny Seher
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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देखो
ऐसे
क़रीब
आने
की
आस
मत
लगाओ
तुम
तन्हाई
से
रब्त
बढ़ाओ
फिर
मेरे
पास
आओ
तुम
Rohit tewatia 'Ishq'
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लगता
है
उसने
मान
ली
है
अब
बड़ों
की
बात
मेरी
मज़ार
पर
नहीं
आती
वो
आजकल
Dipendra Singh 'Raaz'
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लौट
आती
है
मोहब्बत
एक
दिन
इस
ग़लतफ़हमी
में
कुछ
दिन
हम
भी
थे
Dipendra Singh 'Raaz'
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जल्द
लौट
आओ
तुम
तो
बेहतर
है
वक़्त
इतना
नहीं
के
राह
तके
Dipendra Singh 'Raaz'
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मैं
कैसे
चैन
से
सोऊँ
यहाँ
पर
तेरी
यादों
से
कमरा
भर
गया
है
Dipendra Singh 'Raaz'
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तुम्हारे
इश्क़
से
मुझको
अता
हुए
थे
जो
तमाम
ज़ख़्म
वो
मैंने
सदा
हरे
रक्खे
Dipendra Singh 'Raaz'
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