kuchh bhi nahin hai KHaak ke aazaar se pare | कुछ भी नहीं है ख़ाक के आज़ार से परे

  - Dilawar Ali Aazar
कुछभीनहींहैख़ाककेआज़ारसेपरे
देखाहैमैंनेबार-हाउसपारसेपरे
इकनक़्शखींचताहैमुझेख़्वाबसेउधर
इकदायराबनाहुआपरकारसेपरे
या-रबनिगाह-ए-शौक़कोवुसअतनसीबहो
मेरीनज़रपेबारहैदीवारसेपरे
तुमख़ुदहीदास्तानबदलतेहोदफ़अतन
हमवर्नादेखतेनहींकिरदारसेपरे
कुछलफ़्ज़जिनकोअबकोईतरतीबचाहिए
गुज़रेहुएख़यालकेइज़हारसेपरे
'आज़र'अबउनकानाम-ओ-निशाँमिलनहींरहा
उड़ताहुआग़ुबारहैकोहसारसेपरे
  - Dilawar Ali Aazar
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