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Dhiraj Singh 'Tahammul'
ishq ko dhota hua ik khar gaya mujh
ishq ko dhota hua ik khar gaya mujh | इश्क़ को ढोता हुआ इक ख़र गया मुझ
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
इश्क़
को
ढोता
हुआ
इक
ख़र
गया
मुझ
में
अक़्ल
कुछ
बाक़ी
थी
आके
चर
गया
मुझ
में
फ़लसफ़ी
अंदाज़
ये
है
आपकी
नेमत
शा'इरी
करता
था
जो
कल
मर
गया
मुझ
में
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
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इश्क़
करना
इक
सज़ा
है
क्या
करें
इश्क़
का
अपना
मज़ा
है
क्या
करें
Syed Naved Imam
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रास्ता
जब
इश्क़
का
मौजूद
है
फिर
किसी
की
क्यूँँ
इबादत
कीजिए?
ख़ुद-कुशी
करना
बहुत
आसान
है
कुछ
बड़ा
करने
की
हिम्मत
कीजिए
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Bhaskar Shukla
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हाए
रे
मजबूरियाँ,
महरूमियाँ,
नाकामियाँ
इश्क़
आख़िर
इश्क़
है,
तुम
क्या
करो,
हम
क्या
करें
Jigar Moradabadi
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इश्क़
हमारा
चाँद
सितारे
छू
लेगा
घुटनों
पर
आकर
इज़हार
किया
हमने
Darpan
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कुछ
न
मैं
समझा
जुनून
ओ
इश्क़
में
देर
नासेह
मुझ
को
समझाता
रहा
Meer Taqi Meer
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तू
जो
हर
रोज़
नए
हुस्न
पे
मर
जाता
है
तू
बताएगा
मुझे
इश्क़
है
क्या
जाने
दे
Ali Zaryoun
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एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
Ammar Iqbal
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मेरी
अक्ल-ओ-होश
की
सब
हालतें
तुमने
साँचे
में
जुनूँ
के
ढाल
दी
कर
लिया
था
मैंने
अहद-ए-तर्क-ए-इश्क़
तुमने
फिर
बाँहें
गले
में
डाल
दी
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Jaun Elia
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आज
हम
दोनों
को
फ़ुर्सत
है,
चलो
इश्क़
करें
इश्क़
दोनों
की
ज़रूरत
है,
चलो
इश्क़
करें
Rahat Indori
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इश्क़
भी
अक़्ल
के
साथ
करते
हो
तुम
कैसी
बेकार
की
बात
करते
हो
तुम
Intzar Akhtar
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इश्क़
के
हमको
न
पेच–ओ–ख़म
चाहिए
हैं
सुख़न-वर
हम
हमें
तो
ग़म
चाहिए
है
सदाक़त
बात
में
कैसे
हो
यक़ी
सच
में
सच
है
आँख
तब
तो
नम
चाहिए
ना–ख़ुदा
का
कौन
था
काइल
या–ख़ुदा
कौन
है
महफ़िल
में
जिसको
हम
चाहिए
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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ज़िंदगी
की
शमा
जब
जलाई
गई
दर्द
की
संग
में
रौशनाई
गई
अश्क
आँखें
मुसलसल
बहाती
रहीं
पे
मुसलसल
ही
ग़ज़लें
सुनाई
गई
याद
तेरी
रही
साथ
मेरे
मगर
याद
भी
साथ
क्या
वो
भी
आई
गई
ज़ेहन
को
थी
ख़बर
वो
नहीं
है
यहाँ
और
दिल
को
तसल्ली
दिलाई
गई
ले
के
तेरा
गिला
दोस्तों
से
मिला
हस्ब-ए-दस्तूर
मय
भी
पिलाई
गई
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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ख़ून
से
जोड़ा
हुआ
हर
ईंट
ढेला
हो
गया
दो
तरफ़
चूल्हे
जले
औ'
घर
अकेला
हो
गया
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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सुख़न
अब
तक
तिरी
ज़ुल्फ़ों
के
पेचओख़म
में
उलझा
है
हमें
जब
इश्क़
होगा
तो
बयाँ
अश'आर
कर
देंगे
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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शाम
को
दीदार
अपना
आइने
में
हो
गया
फ़ाश
सब
किरदार
अपना
आइने
में
हो
गया
बरगुज़ीदा
एक
सूरत
क़ैद
आँखों
में
हुई
और
बस
घर-बार
अपना
आइने
में
हो
गया
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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