laghzish se rahnumaaon ki jab ham sambhal ga.e | लग़्ज़िश से रहनुमाओं की जब हम सँभल गए

  - Daud Nishat
लग़्ज़िशसेरहनुमाओंकीजबहमसँभलगए
मंज़िलक़रीबआईतोरस्तेबदलगए
हरराह-रौसेतेरापतापूछतेहुए
हमराह-ए-दैर-ओ-का'बासआगेनिकलगए
फूटीहैजबभीतेरेतबस्सुमकीइककिरन
घबराकेख़ुद-बख़ुदहीअंधेरेपिघलगए
रिंदान-ए-तिश्ना-कामकोअबमयसेक्याग़रज़
साक़ीकीचश्म-ए-मस्तसेजबदौरचलगए
अबभीजबीन-ए-ज़ीस्तपेफ़ाक़ोंकीहैशिकन
मानाकिज़िंदगीकेतक़ाज़ेबदलगए
उनकेनुक़ूश-ए-पाकायेए'जाज़देखिए
ज़र्रेमह-ओ-नुजूमकेसाँचेमेंढलगए
जबभीनिखरगयामिरेशे'रोंकाबाँकपन
दोस्तफ़िक्र-ओ-फ़नकेकईदीपजलगए
ऐसीचलींहवाएँहवादिसकी'निशात'
अफ़्साना-ए-हयातकेउनवाँबदलगए
  - Daud Nishat
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