nishaan-e-zakhm pe nishtar-zani jo hone lagii | निशान-ए-ज़ख़्म पे निश्तर-ज़नी जो होने लगी

  - Badr-e-Alam Khalish
निशान-ए-ज़ख़्मपेनिश्तर-ज़नीजोहोनेलगी
लहूमेंज़ुल्मत-ए-शबउँगलियाँभिगोनेलगी
हुआवोजश्नकिनेज़ेबुलंदहोनेलगे
नियामतेग़कीख़ंजरकेसाथसोनेलगी
जहाँमेंदौड़केपहुँचाथावोघनेरीछाँव
ज़रासीदेरमेंज़ार-ओ-क़ताररोनेलगी
नदीडुबाऊथीडूबनापड़ालेकिन
किनारेपहुँचातोशर्मिंदगीडुबोनेलगी
सबअपनीप्यासबुझानेमेंमहवथेहमा-तन
हुआयेफिरकिहवाशो'ला-ख़ेज़होनेलगी
बढ़ाएहाथमददकोदराज़दस्तोंने
तोअपनाबोझवोच्यूँँटीकीतरहढोनेलगी
कुछऔरसुर्ख़-रूहोकरउठेवोमक़्तलसे
घटाभीउट्ठीतोदामनकेदाग़धोनेलगी
वोपीर-ज़नजिसेकाँटेनिकालनेथे'ख़लिश'
वोसाहिराकीतरहसूइयाँचुभोनेलगी
  - Badr-e-Alam Khalish
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