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Daagh Aligarhi
na chaaho kisi ko bhi had se guzar kar
na chaaho kisi ko bhi had se guzar kar | न चाहो किसी को भी हद से गुज़र कर
- Daagh Aligarhi
न
चाहो
किसी
को
भी
हद
से
गुज़र
कर
मिलेगा
वही
जो
मुक़द्दर
में
होगा
- Daagh Aligarhi
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ख़ुद
बुलाओ
के
वो
यूँँ
घर
से
नहीं
निकलेगा
यहाँ
इनाम
मुक़द्दर
से
नहीं
निकलेगा
ऐसे
मौसम
में
बिना
काम
के
आया
हुआ
शख़्स
इतनी
जल्दी
तेरे
दफ़्तर
से
नहीं
निकलेगा
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Khurram Afaq
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फिर
एक
रोज़
मुक़द्दर
से
हार
मानी
गई
ज़बीन
चूम
के
बोला
गया
"ख़ुदा
हाफ़िज़"
Afkar Alvi
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जिन
की
दर्द-भरी
बातों
से
एक
ज़माना
राम
हुआ
'क़ासिर'
ऐसे
फ़न-कारों
की
क़िस्मत
में
बन-बास
रहा
Ghulam Mohammad Qasir
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सितारे
कुछ
बताते
हैं
नतीजा
कुछ
निकलता
है
बड़ी
हैरत
में
हैं
मेरा
मुक़द्दर
देखने
वाले
Madan Mohan Danish
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किताब-ए-मुक़द्दर
में
रांझा
दिवाना
मगर
हीर
बेहद
सयानी
लिखी
थी
Amaan Pathan
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परिंद
पेड़
से
परवाज़
करते
जाते
हैं
कि
बस्तियों
का
मुक़द्दर
बदलता
जाता
है
Asad Badayuni
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सितारे
और
क़िस्मत
देख
कर
घर
से
निकलते
हैं
जो
बुज़दिल
हैं
मुहूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
हमें
लेकिन
सफ़र
की
मुश्किलों
से
डर
नहीं
लगता
कि
हम
बच्चों
की
सूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
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Abrar Kashif
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इस
बेवफ़ाई
पर
मुझे
हैरत
नहीं
तुझको
पा
लूँ
ऐसी
मिरी
क़िस्मत
नहीं
Harsh saxena
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इतने
कहाँ
नसीब
कि
इस
सेे
प्यास
बुझाएँ
खेल
करें
दरिया
हम
जैसों
को
अपने
पास
बिठा
ले
काफ़ी
है
Vashu Pandey
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ऐ
मुस्कुराते
शख़्स
हमारी
तरफ़
न
आ
वापिस
यहाँ
से
कोई
भी
हँस
कर
नहीं
गया
मुझको
तुम्हारे
बाद
किसी
और
की
तरफ़
ले
जा
रहा
था
मेरा
मुक़द्दर
नहीं
गया
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Inaam Azmi
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उसको
ख़ाहिश
है
मुझ
सेे
मिलने
की
जिस
सेे
आकर
सितारे
मिलते
हैं
Daagh Aligarhi
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हमने
देखा
है
दाग़
दुनिया
में,
बेवकूफ़ों
को
दाद
मिलती
है
Daagh Aligarhi
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कूचा
ए
यार
से
चले
निकले
ख़ुल्द
के
द्वार
से
चले
निकले
वक़्त
ठहराव
चाहता
था
और
हम
थे
रफ़्तार
से
चले
निकले
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Daagh Aligarhi
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उसने
देखा
जो
मुस्कुराते
हुए
मर
गए
लोग
कसमसाते
हुए
मैं
वो
मजनूँ
नहीं
जो
मर
जाऊँ
ख़ाक
सहराओं
में
उड़ाते
हुए
आग
थी
आग
और
भी
भड़की
आग
से
आग
को
बुझाते
हुए
लाख
वादे
किए
थे
उसने
भी
जिस्म
से
जिस्म
को
दबाते
हुए
और
फिर
दूर
हो
गए
दोनों
दरमियाँ
दूरियाँ
मिटाते
हुए
कितने
पुर्ज़े
लगे
थे
याद
नहीं
मैं
मगन
था
घड़ी
बनाते
हुए
और
कब
तक
चलूँ
तेरी
जानिब
मैं
अकेला
क़दम
बढ़ाते
हुए
कब
तकल्लुफ़
से
चैन
पाएगा
तू
नए
आदमी
बनाते
हुए
क्या
तुझे
मैं
भी
याद
आता
हूँ
मेरी
ग़ज़लों
को
गुनगुनाते
हुए
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Daagh Aligarhi
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