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Daagh Aligarhi
koocha ae yaar se chale nikle
koocha ae yaar se chale nikle | कूचा ए यार से चले निकले
- Daagh Aligarhi
कूचा
ए
यार
से
चले
निकले
ख़ुल्द
के
द्वार
से
चले
निकले
वक़्त
ठहराव
चाहता
था
और
हम
थे
रफ़्तार
से
चले
निकले
- Daagh Aligarhi
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कब
लौटा
है
बहता
पानी
बिछड़ा
साजन
रूठा
दोस्त
हम
ने
उस
को
अपना
जाना
जब
तक
हाथ
में
दामाँ
था
Ibn E Insha
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आदतन
उसके
लिए
फूल
ख़रीदे
वरना
नहीं
मालूम
वो
इस
बार
यहाँ
है
कि
नहीं
Abbas Tabish
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वो
चाहे
मजनूँ
हो,
फ़रहाद
हो
कि
राँझा
हो
हर
एक
शख़्स
मेरा
हम
सबक़
निकलता
है
Munawwar Rana
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ये
दाग़
दाग़
उजाला
ये
शब-गज़ीदा
सहर
वो
इंतिज़ार
था
जिस
का
ये
वो
सहर
तो
नहीं
Faiz Ahmad Faiz
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कुछ
एक
की
हम
जैसी
क़िस्मत
होती
है
बाकी
सब
की
अच्छी
क़िस्मत
होती
है
Bhaskar Shukla
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कल
रात
बहुत
ग़ौर
किया
है
सो
हम
उसकी
तय
करके
उठे
हैं
कि
तमन्ना
ना
करेंगे
इस
बार
वो
तल्ख़ी
है
की
रूठे
भी
नहीं
हम
अबके
वो
लड़ाई
है
के
झगड़ा
ना
करेंगे
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Jaun Elia
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जिस
तरफ़
तू
है
उधर
होंगी
सभी
की
नज़रें
ईद
के
चाँद
का
दीदार
बहाना
ही
सही
Amjad Islam Amjad
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कई
शे'र
पढ़
कर
है
ये
बात
जानी
कोई
शे'र
उसके
मुक़ाबिल
नहीं
है
Alankrat Srivastava
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सितारे
और
क़िस्मत
देख
कर
घर
से
निकलते
हैं
जो
बुज़दिल
हैं
मुहूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
हमें
लेकिन
सफ़र
की
मुश्किलों
से
डर
नहीं
लगता
कि
हम
बच्चों
की
सूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
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Abrar Kashif
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है
अब
भी
बिस्तर-ए-जाँ
पर
तिरे
बदन
की
शिकन
मैं
ख़ुद
ही
मिटने
लगा
हूँ
उसे
मिटाते
हुए
Azhar Iqbal
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न
चाहो
किसी
को
भी
हद
से
गुज़र
कर
मिलेगा
वही
जो
मुक़द्दर
में
होगा
Daagh Aligarhi
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उसको
ख़ाहिश
है
मुझ
सेे
मिलने
की
जिस
सेे
आकर
सितारे
मिलते
हैं
Daagh Aligarhi
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हमने
देखा
है
दाग़
दुनिया
में,
बेवकूफ़ों
को
दाद
मिलती
है
Daagh Aligarhi
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उसने
देखा
जो
मुस्कुराते
हुए
मर
गए
लोग
कसमसाते
हुए
मैं
वो
मजनूँ
नहीं
जो
मर
जाऊँ
ख़ाक
सहराओं
में
उड़ाते
हुए
आग
थी
आग
और
भी
भड़की
आग
से
आग
को
बुझाते
हुए
लाख
वादे
किए
थे
उसने
भी
जिस्म
से
जिस्म
को
दबाते
हुए
और
फिर
दूर
हो
गए
दोनों
दरमियाँ
दूरियाँ
मिटाते
हुए
कितने
पुर्ज़े
लगे
थे
याद
नहीं
मैं
मगन
था
घड़ी
बनाते
हुए
और
कब
तक
चलूँ
तेरी
जानिब
मैं
अकेला
क़दम
बढ़ाते
हुए
कब
तकल्लुफ़
से
चैन
पाएगा
तू
नए
आदमी
बनाते
हुए
क्या
तुझे
मैं
भी
याद
आता
हूँ
मेरी
ग़ज़लों
को
गुनगुनाते
हुए
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Daagh Aligarhi
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