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Anmol Mishra
mehakte pannon ki bheenee KHushboo nasha chadaaye alag tarah ka
mehakte pannon ki bheenee KHushboo nasha chadaaye alag tarah ka | महकते पन्नों की भीनी ख़ुशबू नशा चढ़ाए अलग तरह का
- Anmol Mishra
महकते
पन्नों
की
भीनी
ख़ुशबू
नशा
चढ़ाए
अलग
तरह
का
जहाँँ
में
जितने
शराबख़ाने
बनाओ
सारे
किताबख़ाने
- Anmol Mishra
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जहाँ
से
जी
न
लगे
तुम
वहीं
बिछड़
जाना
मगर
ख़ुदा
के
लिए
बे-वफ़ाई
न
करना
Munawwar Rana
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इस
दौर
के
मर्दों
की
जो
की
शक्ल-शुमारी
साबित
हुआ
दुनिया
में
ख़्वातीन
बहुत
हैं
Sarfaraz Shahid
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यक़ीं
मोहकम
अमल
पैहम
मोहब्बत
फ़ातेह-ए-आलम
जिहाद-ए-ज़िंदगानी
में
हैं
ये
मर्दों
की
शमशीरें
Allama Iqbal
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दुनिया
ने
बोला
के
तुम
सेे
नहीं
होगा
अच्छा
है
मैं
थोड़ा
ऊँचा
सुनता
हूँ
Divy Kamaldhwaj
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इतने
दुख
से
भरी
है
ये
दुनिया
आँख
खुलते
ही
आँख
भर
आए
shampa andaliib
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मकाँ
तो
है
नहीं
जो
खींच
दें
दीवार
इस
दिल
में
कोई
दूजा
नहीं
रह
पाएगा
अब
यार
इस
दिल
में
जहाँ
भर
में
लुटाते
फिर
रहे
है
कम
नहीं
होता
तुम्हारे
वास्ते
इतना
रखा
था
प्यार
इस
दिल
में
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Bhaskar Shukla
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जिसकी
ख़ातिर
हम
भुला
बैठे
हैं
दुनिया
दोस्तों
से
ही
उन्हें
फ़ुर्सत
नहीं
है
Shashank Shekhar Pathak
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हम
क्या
करें
अगर
न
तिरी
आरज़ू
करें
दुनिया
में
और
भी
कोई
तेरे
सिवा
है
क्या
Hasrat Mohani
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जहाँ
तक
आके
तुम
वापस
गए
हो
वहाँ
अब
तक
कोई
पहुँचा
नहीं
है
Zubair Ali Tabish
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जहाँ
जो
था
वहीं
रहना
था
उस
को
मगर
ये
लोग
हिजरत
कर
रहे
हैं
Liaqat Jafri
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बहुत
वो
दूर
हैं
हम
सेे
और
अब
हम
काश
हैं
उनके
सुना
है
कल
जो
मेरे
ख़ास
थे
अब
पास
हैं
उनके
Anmol Mishra
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ये
क़िस्सा
पूर
होना
चाहिए
था
बहुत
मशहूर
होना
चाहिए
था
तुम्हारी
मांँग
क्यूँँंँ
ख़ाली
है
अब
तक
यहाँ
सिन्दूर
होना
चाहिए
था
अरे
तुम
दिल
में
हो
मेरे
अभी
तक
तुम्हें
तो
दूर
होना
चाहिए
था
दिखाता
सच
अभी
भी
है
सलामत
ये
शीशा
चूर
होना
चाहिए
था
ठिकाने
अक़्ल
आती
हुक्मरानों
तुम्हें
मज़दूर
होना
चाहिए
था
हमन
होते
बहुत
भोले
के
प्यारे
हमन
धर्तूर
होना
चाहिए
था
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Anmol Mishra
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शमा
जलाने
को
सब
हैं
कहते
बहुत
अँधेरा
बिखर
रहा
है
हटा
दो
ज़ुल्फ़ें
हुआ
उजाला
जरा
सा
हँस
दो
हुआ
सवेरा
Anmol Mishra
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भेद
ज़रा
बतला
दे
जोगी
जीवन
क्या
है
गा
दे
जोगी
मत्था
मेरा
हत्था
तेरा
नत्था
से
मिलवा
दे
जोगी
आँख
का
पानी
सूख
गया
है
कारे
घन
बरसा
दे
जोगी
नगरी
नगरी
खोज
रहा
है
कोई
गले
लगा
दे
जोगी
कितनी
बातें
भूल
गया
है
इतनी
और
भुला
दे
जोगी
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Anmol Mishra
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रात
की
वहशत
को
जानो
डर
गए
बोल
लो
ख़ुद
से
कभी
लो
डर
गए
इश्क़
के
जलते
चराग़ों
क्या
हुआ
तुम
अभी
से
बुझ
रहे
हो
डर
गए
जिस्म
के
हर
मोड़
को
तो
छू
लिया
रूह
पर
भी
हाथ
रक्खो
डर
गए
झूलना
पंखे
से
चाहा
जब
कभी
देखकर
कमज़ोर
छत
को
डर
गए
मानता
हूँ
मैं
ग़लत
था
ठीक
है
आँख
से
आँखें
मिलाओ
डर
गए
रोज़
हालातों
से
हम
लड़ते
रहे
जीते
जी
वो
मर
गए
जो
डर
गए
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Anmol Mishra
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