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Ananya Rai Parashar
kisi ki kat rahi hai bas gamon men
kisi ki kat rahi hai bas gamon men | किसी की कट रही है बस ग़मों में
- Ananya Rai Parashar
किसी
की
कट
रही
है
बस
ग़मों
में
किसी
की
ज़िंदगी
कितनी
हसीं
है
- Ananya Rai Parashar
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न
जाने
कैसी
महक
आ
रही
है
बस्ती
से
वही
जो
दूध
उबलने
के
बाद
आती
है
Munawwar Rana
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जिसकी
ख़ातिर
कितनी
रातें
सुलगाई
जिसके
दुख
में
दिल
जाने
क्यूँ
रोता
है
इक
दिन
हम
सेे
पूछ
रही
थी
वो
लड़की
प्यार
में
कोई
पागल
कैसे
होता
है
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Ritesh Rajwada
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ज़िंदगी
यूँँ
हुई
बसर
तन्हा
क़ाफ़िला
साथ
और
सफ़र
तन्हा
Gulzar
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अभी
से
पाँव
के
छाले
न
देखो
अभी
यारो
सफ़र
की
इब्तिदा
है
Ejaz Rahmani
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मेरी
हर
बात
बे-असर
ही
रही
नक़्स
है
कुछ
मिरे
बयान
में
क्या
Jaun Elia
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बंद
कमरा,
सर
पे
पंखा,
तीरगी
है
और
मैं
एक
लड़ाई
चल
रही
है
ज़िंदगी
है
औऱ
मैं
Shadab Asghar
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न
हम-सफ़र
न
किसी
हम-नशीं
से
निकलेगा
हमारे
पाँव
का
काँटा
हमीं
से
निकलेगा
Rahat Indori
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किसी
को
घर
से
निकलते
ही
मिल
गई
मंज़िल
कोई
हमारी
तरह
उम्र
भर
सफ़र
में
रहा
Ahmad Faraz
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सफ़र
पीछे
की
जानिब
है
क़दम
आगे
है
मेरा
मैं
बूढ़ा
होता
जाता
हूँ
जवाँ
होने
की
ख़ातिर
Zafar Iqbal
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल
तो
जुस्तुजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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रु-ब-रु
ऐसी
पास
बस्ती
है
रोते
चेहरे
उदास
बस्ती
है
Ananya Rai Parashar
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दिल
मसर्रत
से
भर
नहीं
आता
जब
मुझे
वो
नज़र
नहीं
आता
Ananya Rai Parashar
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उसने
जब
भी
कभी
मोहब्बत
की
जैसे
मुझपे
कोई
इनायत
की
डूब
जाते
हैं
अहल-ए-दिल
इस
में
मैं
वही
झील
हूँ
मोहब्बत
की
फिर
मेरे
रू-ब-रू
वो
आया
है
फिर
ख़बर
हो
गई
क़यामत
की
होंठ
पर
होंठ
रख
दिए
मैंने
क्या
ज़रूरत
है
अब
इजाज़त
की
जब
तेरा
लम्स
हो
गया
हासिल
किसको
परवाह
कोई
जन्नत
की
ऐसे
मंज़िल
नहीं
मिली
मुझको
मैने
पाने
को
ख़ूब
मेहनत
की
ग़मज़दों
ने
सजाई
थी
महफ़िल
और
मैने
वहाँ
निज़ामत
की
आज़माओ
ना
तुम
'अनन्या'
को
हद
होती
है
इक
शराफ़त
की
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Ananya Rai Parashar
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ग़रीबों
की
कुछ
आह-ओ-ज़ारी
भी
सुनिए
बस
अपनी
न
कहिए
हमारी
भी
सुनिए
सुकूँ
दिल
का
सुनते
हैं
गर
आप
साहब
तो
दिल
की
कभी
बेक़रारी
भी
सुनिए
कहीं
तन्हा
हो
जाए
तो
ख़ौफ़
खाए
है
बेबस
यहाँ
कितनी
नारी
भी
सुनिए
समाजों
की
सुननी
है
सच्चाई
तो
फिर
समाजों
की
बंदिश
ख़ुमारी
भी
सुनिए
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Ananya Rai Parashar
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ग़म
भुलाने
की
बात
क्यूँ
न
करें
मुस्कुराने
की
बात
क्यूँ
न
करें
अपनी
तहज़ीब
है
रिवायत
है
हम
ज़माने
की
बात
क्यूँ
न
करें
क्या
ये
शिकवे
ज़ुबां
पे
रखते
हैं
दिल
चुराने
की
बात
क्यूँ
न
करें
बैठकर
साथ
हम
बुजुर्गों
के
घर
घराने
की
बात
क्यूँ
न
करें
वो
जो
मरता
है
मेरी
बातों
पे
उस
दीवाने
की
बात
क्यूँ
न
करें
बात
क्यूँ
कर
हो
आंधियों
की
भला
आशियाने
की
बात
क्यूँ
न
करें
इतनी
ख़ामोशियां
भी
अच्छी
नहीं
गुनगुनाने
की
बात
क्यूँ
न
करें
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Ananya Rai Parashar
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