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Ammar Iqbal
mujh ko is lafz ka matlab nahin maaloom magar
mujh ko is lafz ka matlab nahin maaloom magar | मुझको इस लफ़्ज़ का मतलब नहीं मालूम मगर
- Ammar Iqbal
मुझको
इस
लफ़्ज़
का
मतलब
नहीं
मालूम
मगर
आपकी
हम्म
ने
मुझे
सोच
में
डाला
हुआ
है
- Ammar Iqbal
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रात
से
जंग
कोई
खेल
नईं
तुम
चराग़ों
में
इतना
तेल
नईं
आ
गया
हूँ
तो
खींच
अपनी
तरफ़
मेरी
जानिब
मुझे
धकेल
नईं
जब
मैं
चाहूँगा
छोड़
जाऊँगा
इक
सराए
है
जिस्म
जेल
नईं
बेंच
देखी
है
ख़्वाब
में
ख़ाली
और
पटरी
पर
उस
पे
रेल
नईं
जिस
को
देखा
था
कल
दरख़्त
के
गिर्द
वो
हरा
अज़दहा
था
बेल
नईं
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तीरगी
ताक़
में
जड़ी
हुई
है
धूप
दहलीज़
पर
पड़ी
हुई
है
दिल
पे
नाकामियों
के
हैं
पैवंद
आस
की
सोई
भी
गड़ी
हुई
है
मेरे
जैसी
है
मेरी
परछाईं
धूप
में
पल
के
ये
बड़ी
हुई
है
घेर
रक्खा
है
ना-रसाई
ने
और
ख़्वाहिश
वहीं
खड़ी
हुई
है
मैं
ने
तस्वीर
फेंक
दी
है
मगर
कील
दीवार
में
गड़ी
हुई
है
हारता
भी
नहीं
ग़म-ए-दौराँ
ज़िद
पे
उम्मीद
भी
अड़ी
हुई
है
दिल
किसी
के
ख़याल
में
है
गुम
रात
को
ख़्वाब
की
पड़ी
हुई
है
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ख़ुद-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
अपनी
हस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
जब
से
देखा
है
इस
फ़क़ीरनी
को
फ़ाक़ा-मस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ख़ुद
तराशा
है
जब
से
बुत
अपना
बुत-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ये
फ़लक-ज़ाद
की
कहानी
है
इस
को
पस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
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बात
मैं
सरसरी
नहीं
करता
और
वज़ाहत
कभी
नहीं
करता
एक
ही
बात
मुझ
में
अच्छी
है
और
मैं
बस
वही
नहीं
करता
मुझको
कैसे
मिले
भला
फुर्सत
मैं
कोई
काम
ही
नहीं
करता
आप
ही
लोग
मार
देते
हैं
कोई
भी
ख़ुद-कुशी
नहीं
करता
एक
जुगनू
है
तेरी
यादों
का
जो
कभी
रौशनी
नहीं
करता
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मैं
आईनों
को
देखे
जा
रहा
था
अब
इन
से
बात
भी
करने
लगा
हूँ
Ammar Iqbal
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