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Ammar Iqbal
baat main sarsari nahin karta
baat main sarsari nahin karta | बात मैं सरसरी नहीं करता
- Ammar Iqbal
बात
मैं
सरसरी
नहीं
करता
और
वज़ाहत
कभी
नहीं
करता
एक
ही
बात
मुझ
में
अच्छी
है
और
मैं
बस
वही
नहीं
करता
मुझको
कैसे
मिले
भला
फुर्सत
मैं
कोई
काम
ही
नहीं
करता
आप
ही
लोग
मार
देते
हैं
कोई
भी
ख़ुद-कुशी
नहीं
करता
एक
जुगनू
है
तेरी
यादों
का
जो
कभी
रौशनी
नहीं
करता
- Ammar Iqbal
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तुम्हारे
बाद
अब
मैं
क्या
करूँँगा
गुज़रती
गाड़ियाँ
देखा
करूँँगा
मेरे
मरने
पे
काफ़ी
लोग
होंगे
मैं
अपनी
मौत
पर
ख़र्चा
करूँँगा
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Asif Ali
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शबो
रोज़
की
चाकरी
ज़िन्दगी
की
मुयस्सर
हुईं
रोटियाँ
दो
घड़ी
की
नहीं
काम
आएँ
जो
इक
दिन
मशीनें
ज़रूरत
बने
आदमी
आदमी
की
कि
कल
शाम
फ़ुरसत
में
आई
उदासी
बता
दी
मुझे
क़ीमतें
हर
ख़ुशी
की
किया
क्या
अमन
जी
ने
बाइस
बरस
में
कभी
जी
लिया
तो
कभी
ख़ुद-कुशी
की
ग़मों
को
ठिकाने
लगाते
लगाते
घड़ी
आ
गई
आदमी
के
ग़मी
की
ये
सारी
तपस्या
का
कारण
यही
है
मिसालें
बनें
तो
बनें
सादगी
की
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Aman G Mishra
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जब
से
छेड़ा
है
मेरे
ज़ख़्मों
को
आ
रही
मौत
की
सदा
मुझको
Rachit Sonkar
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हम
हैं
ना!
ये
जो
मुझ
सेे
कहते
हैं
ख़ुद
किसी
और
के
भरोसे
हैं
ज़िंदगी
के
लिए
बताओ
कुछ
ख़ुद-कुशी
के
तो
सौ
तरीक़े
हैं
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Vikram Gaur Vairagi
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मौत
ने
सारी
रात
हमारी
नब्ज़
टटोली
ऐसा
मरने
का
माहौल
बनाया
हमने
घर
से
निकले
चौक
गए
फिर
पार्क
में
बैठे
तन्हाई
को
जगह-जगह
बिखराया
हमने
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Shariq Kaifi
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अब
ज़िन्दगी
से
कोई
मिरा
वास्ता
नहीं
पर
ख़ुद-कुशी
भी
कोई
सही
रास्ता
नहीं
Rahul
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रहता
है
इबादत
में
हमें
मौत
का
खटका
हम
याद-ए-ख़ुदा
करते
हैं
कर
ले
न
ख़ुदा
याद
Akbar Allahabadi
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मौत
का
भी
इलाज
हो
शायद
ज़िंदगी
का
कोई
इलाज
नहीं
Firaq Gorakhpuri
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ज़िंदगी
फ़िरदौस-ए-गुम-गश्ता
को
पा
सकती
नहीं
मौत
ही
आती
है
ये
मंज़िल
दिखाने
के
लिए
Hafeez Jalandhari
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यहाँ
मौत
का
ख़ौफ़
कुछ
यूँँ
है
सबको
कि
जीने
की
ख़ातिर
मरे
जा
रहे
हैं
Sapna Moolchandani
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नज़र
से
तुम
को
मिले
न
कोई
सुराग़
दिल
का
झुका
के
गर्दन
बुझा
लिया
है
चराग़
दिल
का
सुनूँ
न
कैसे
करूँँ
न
क्यूँँकर
मैं
अपने
दिल
की
मेरे
अलावा
है
कौन
इस
बद-दिमाग़
दिल
का
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Ammar Iqbal
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कैसा
मुझ
को
बना
दिया
'अम्मार'
कौन
सा
रंग
भर
गए
मुझ
में
Ammar Iqbal
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ख़ुद
ही
जाने
लगे
थे
और
ख़ुद
ही
रास्ता
रोक
कर
खड़े
हुए
हैं
Ammar Iqbal
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रात
से
जंग
कोई
खेल
नईं
तुम
चराग़ों
में
इतना
तेल
नईं
आ
गया
हूँ
तो
खींच
अपनी
तरफ़
मेरी
जानिब
मुझे
धकेल
नईं
जब
मैं
चाहूँगा
छोड़
जाऊँगा
इक
सराए
है
जिस्म
जेल
नईं
बेंच
देखी
है
ख़्वाब
में
ख़ाली
और
पटरी
पर
उस
पे
रेल
नईं
जिस
को
देखा
था
कल
दरख़्त
के
गिर्द
वो
हरा
अज़दहा
था
बेल
नईं
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Ammar Iqbal
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मुझको
इस
लफ़्ज़
का
मतलब
नहीं
मालूम
मगर
आपकी
हम्म
ने
मुझे
सोच
में
डाला
हुआ
है
Ammar Iqbal
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