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Ammar Iqbal
teergii taq men ja
teergii taq men ja | तीरगी ताक़ में जड़ी हुई है
- Ammar Iqbal
तीरगी
ताक़
में
जड़ी
हुई
है
धूप
दहलीज़
पर
पड़ी
हुई
है
दिल
पे
नाकामियों
के
हैं
पैवंद
आस
की
सोई
भी
गड़ी
हुई
है
मेरे
जैसी
है
मेरी
परछाईं
धूप
में
पल
के
ये
बड़ी
हुई
है
घेर
रक्खा
है
ना-रसाई
ने
और
ख़्वाहिश
वहीं
खड़ी
हुई
है
मैं
ने
तस्वीर
फेंक
दी
है
मगर
कील
दीवार
में
गड़ी
हुई
है
हारता
भी
नहीं
ग़म-ए-दौराँ
ज़िद
पे
उम्मीद
भी
अड़ी
हुई
है
दिल
किसी
के
ख़याल
में
है
गुम
रात
को
ख़्वाब
की
पड़ी
हुई
है
- Ammar Iqbal
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सिर्फ़
तस्वीर
रह
गई
बाक़ी
जिस
में
हम
एक
साथ
बैठे
हैं
Bilal Ameer Ahmad
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तुझको
बतलाता
मगर
शर्म
बहुत
आती
है
तेरी
तस्वीर
से
जो
काम
लिया
जाता
है
Tehzeeb Hafi
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कुछ
भी
नहीं
तो
पेड़
की
तस्वीर
ही
सही
घर
में
थोड़ी
बहुत
तो
हरियाली
चाहिये
Himanshu Kiran Sharma
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ज़िंदगी
भर
वो
उदासी
के
लिए
काफ़ी
है
एक
तस्वीर
जो
हँसते
हुए
खिंचवाई
थी
Yasir Khan
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तेरी
तस्वीर
अगर
बनाते
हम
तेरे
बारे
में
क्या
बताते
हम
ढूँढ़ना
है
उसे
अंधेरे
में
और
दिया
भी
नहीं
बनाते
हम
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Tajdeed Qaiser
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उठाओ
कैमरा
तस्वीर
खींच
लो
इन
की
उदास
लोग
कहाँ
रोज़
मुस्कराते
हैं
Malikzada Javed
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तू
कभी
मुझ
सेे
मिला
तस्वीर
मेरी
देख
फिर
कोई
जुदा
तस्वीर
मेरी
इक
बनानी
थी
उसे
ग़मगीन
सूरत
वो
बनाता
ही
गया
तस्वीर
मेरी
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Dileep Kumar
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चाँद
भी
हैरान
दरिया
भी
परेशानी
में
है
अक्स
किस
का
है
कि
इतनी
रौशनी
पानी
में
है
Farhat Ehsaas
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ज़िंदगी
भर
के
लिए
रूठ
के
जाने
वाले
मैं
अभी
तक
तिरी
तस्वीर
लिए
बैठा
हूँ
Qaisar-ul-Jafri
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नमक
हल्दी
ज़ियादा
दाल
में
छोड़ा
गया
था
बतायें
क्या
हमें
किस
हाल
में
छोड़ा
गया
था
अधूरी
एक
उस
तस्वीर
पर
सब
मर
मिटे
थे
बनाकर
यार
डिम्पल
गाल
में
छोड़ा
गया
था
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Atul K Rai
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ख़ुद-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
अपनी
हस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
जब
से
देखा
है
इस
फ़क़ीरनी
को
फ़ाक़ा-मस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ख़ुद
तराशा
है
जब
से
बुत
अपना
बुत-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ये
फ़लक-ज़ाद
की
कहानी
है
इस
को
पस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
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Ammar Iqbal
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ज़रा
सी
देर
जले
जल
के
राख
हो
जाए
वो
रौशनी
दे
भले
जल
के
राख
हो
जाए
वो
आफ़्ताब
जिसे
सब
सलाम
करते
हैं
जो
वक़्त
पर
न
ढले
जल
के
राख
हो
जाए
मैं
दूर
जा
के
कहीं
बाँसुरी
बजाऊँगा
बला
से
रोम
जले
जल
के
राख
हो
जाए
वो
एक
लम्स-ए-गुरेज़ाँ
है
आतिश-ए-बे-सोज़
मुझे
लगाए
गले
जल
के
राख
हो
जाए
कोई
चराग़
बचे
सुब्ह
तक
तो
तारीकी
उसी
चराग़-तले
जल
के
राख
हो
जाए
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Ammar Iqbal
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मर्तबा
था
मकाम
था
मेरा
रोशनी
पर
कयाम
था
मेरा
मैं
ही
भेजा
गया
था
पहले
भी
तब
कोई
और
नाम
था
मेरा
आख़िरी
वक़्त
आँख
खुल
गई
थी
वरना
क़िस्सा
तमाम
था
मेरा
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Ammar Iqbal
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तख़य्युल
को
बरी
करने
लगा
हूँ
मैं
ज़ेहनी
ख़ुद-कुशी
करने
लगा
हूँ
मुझे
ज़िंदा
जलाया
जा
रहा
है
तो
क्या
मैं
रौशनी
करने
लगा
हूँ
मैं
आईनों
को
देखे
जा
रहा
था
अब
इन
से
बात
भी
करने
लगा
हूँ
तुम्हारी
बस
तुम्हारी
दुश्मनी
में
मैं
सब
से
दोस्ती
करने
लगा
हूँ
मुझे
गुमराह
करना
ग़ैर-मुमकिन
मैं
अपनी
पैरवी
करने
लगा
हूँ
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Ammar Iqbal
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एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
Ammar Iqbal
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