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Ammar Iqbal
martaba tha makaam tha meraa
martaba tha makaam tha meraa | मर्तबा था मकाम था मेरा
- Ammar Iqbal
मर्तबा
था
मकाम
था
मेरा
रोशनी
पर
कयाम
था
मेरा
मैं
ही
भेजा
गया
था
पहले
भी
तब
कोई
और
नाम
था
मेरा
आख़िरी
वक़्त
आँख
खुल
गई
थी
वरना
क़िस्सा
तमाम
था
मेरा
- Ammar Iqbal
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कोई
दवा
न
दे
सके
मशवरा-ए-दुआ
दिया
चारागरों
ने
और
भी
दर्द
दिल
का
बढ़ा
दिया
Hafeez Jalandhari
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लो
आज
हमने
तोड़
दिया
रिश्ता-ए-उम्मीद
लो
अब
कभी
गिला
न
करेंगे
किसी
से
हम
Sahir Ludhianvi
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कोई
तितली
पकड़
लें
अगर
फूल
पर
रख
दिया
कीजिए
Vikas Rana
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बैठे
बैठे
फेंक
दिया
है
आतिश-दान
में
क्या
क्या
कुछ
मौसम
इतना
सर्द
नहीं
था
जितनी
आग
जला
ली
है
Zulfiqar aadil
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जबसे
आप
गए
हो
मेरे
जीवन
से
गाने
सुनता
हूँ,
पर
गाना
छोड़
दिया
Tanoj Dadhich
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आग
का
क्या
है
पल
दो
पल
में
लगती
है
बुझते
बुझते
एक
ज़माना
लगता
है
Kaif Bhopali
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उस
के
फ़रोग़-ए-हुस्न
से
झमके
है
सब
में
नूर
शम-ए-हरम
हो
या
हो
दिया
सोमनात
का
Meer Taqi Meer
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पेड़
का
दुख
तो
कोई
पूछने
वाला
ही
न
था
अपनी
ही
आग
में
जलता
हुआ
साया
देखा
Jameel Malik
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कितनी
उजलत
में
मिटा
डाला
गया
आग
में
सब
कुछ
जला
डाला
गया
Manish Shukla
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ज़बाने
दाग़
में
मैंने
उसे
लिखी
चिट्ठी
मिज़ाजे
मीर
में
उसने
मुझे
जवाब
दिया
Shadan Ahsan Marehrvi
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तीरगी
ताक़
में
जड़ी
हुई
है
धूप
दहलीज़
पर
पड़ी
हुई
है
दिल
पे
नाकामियों
के
हैं
पैवंद
आस
की
सोई
भी
गड़ी
हुई
है
मेरे
जैसी
है
मेरी
परछाईं
धूप
में
पल
के
ये
बड़ी
हुई
है
घेर
रक्खा
है
ना-रसाई
ने
और
ख़्वाहिश
वहीं
खड़ी
हुई
है
मैं
ने
तस्वीर
फेंक
दी
है
मगर
कील
दीवार
में
गड़ी
हुई
है
हारता
भी
नहीं
ग़म-ए-दौराँ
ज़िद
पे
उम्मीद
भी
अड़ी
हुई
है
दिल
किसी
के
ख़याल
में
है
गुम
रात
को
ख़्वाब
की
पड़ी
हुई
है
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रात
से
जंग
कोई
खेल
नईं
तुम
चराग़ों
में
इतना
तेल
नईं
आ
गया
हूँ
तो
खींच
अपनी
तरफ़
मेरी
जानिब
मुझे
धकेल
नईं
जब
मैं
चाहूँगा
छोड़
जाऊँगा
इक
सराए
है
जिस्म
जेल
नईं
बेंच
देखी
है
ख़्वाब
में
ख़ाली
और
पटरी
पर
उस
पे
रेल
नईं
जिस
को
देखा
था
कल
दरख़्त
के
गिर्द
वो
हरा
अज़दहा
था
बेल
नईं
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उसने
नासूर
कर
लिया
होगा
ज़ख़्म
को
शाएरी
बनाते
हुए
Ammar Iqbal
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अक्स
कितने
उतर
गए
मुझ
में
फिर
न
जाने
किधर
गए
मुझ
में
मैं
ने
चाहा
था
ज़ख़्म
भर
जाएँ
ज़ख़्म
ही
ज़ख़्म
भर
गए
मुझ
में
मैं
वो
पल
था
जो
खा
गया
सदियाँ
सब
ज़माने
गुज़र
गए
मुझ
में
ये
जो
मैं
हूँ
ज़रा
सा
बाक़ी
हूँ
वो
जो
तुम
थे
वो
मर
गए
मुझ
में
मेरे
अंदर
थी
ऐसी
तारीकी
आ
के
आसेब
डर
गए
मुझ
में
पहले
उतरा
मैं
दिल
के
दरिया
में
फिर
समुंदर
उतर
गए
मुझ
में
कैसा
मुझ
को
बना
दिया
'अम्मार'
कौन
सा
रंग
भर
गए
मुझ
में
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Ammar Iqbal
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नज़र
से
तुम
को
मिले
न
कोई
सुराग़
दिल
का
झुका
के
गर्दन
बुझा
लिया
है
चराग़
दिल
का
सुनूँ
न
कैसे
करूँँ
न
क्यूँँकर
मैं
अपने
दिल
की
मेरे
अलावा
है
कौन
इस
बद-दिमाग़
दिल
का
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Ammar Iqbal
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