hi
0
Search
Shayari
Writers
Events
Blog
Store
Help
Login
By:
00:00/00:00
Ammar Iqbal
khud-parasti se ishq ho gaya hai
khud-parasti se ishq ho gaya hai | ख़ुद-परस्ती से इश्क़ हो गया है
- Ammar Iqbal
ख़ुद-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
अपनी
हस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
जब
से
देखा
है
इस
फ़क़ीरनी
को
फ़ाक़ा-मस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ख़ुद
तराशा
है
जब
से
बुत
अपना
बुत-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ये
फ़लक-ज़ाद
की
कहानी
है
इस
को
पस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
- Ammar Iqbal
Download Ghazal Image
शहर-वालों
की
मोहब्बत
का
मैं
क़ायल
हूँ
मगर
मैंने
जिस
हाथ
को
चूमा
वही
ख़ंजर
निकला
Ahmad Faraz
Send
Download Image
33 Likes
दिल
की
बस्ती
पुरानी
दिल्ली
है
जो
भी
गुज़रा
है
उसने
लूटा
है
Bashir Badr
Send
Download Image
32 Likes
तमाम
शहर
को
तारीकियों
से
शिकवा
है
मगर
चराग़
की
बैअत
से
ख़ौफ़
आता
है
Aziz Nabeel
Send
Download Image
18 Likes
उसी
का
शहर
वही
मुद्दई
वही
मुंसिफ़
हमें
यक़ीं
था
हमारा
क़ुसूर
निकलेगा
Ameer Qazalbash
Send
Download Image
40 Likes
ऊँचे
नीचे
घर
थे
बस्ती
में
बहुत
ज़लज़ले
ने
सब
बराबर
कर
दिए
Zubair Ali Tabish
Send
Download Image
28 Likes
'इंशा'-जी
उठो
अब
कूच
करो
इस
शहर
में
जी
को
लगाना
क्या
वहशी
को
सुकूँ
से
क्या
मतलब
जोगी
का
नगर
में
ठिकाना
क्या
Ibn E Insha
Send
Download Image
25 Likes
यूँँ
ही
नहीं
बस्ती
जली,
यूँँ
ही
नहीं
सब
लड़
मरे
कुछ
लोग
आए
बाहरी,
फिर
मज़हबी
दंगा
हुआ
Ankit Raj
Send
Download Image
3 Likes
बदन
लिए
तलाशता
फिरू
हूँ
रात
दिन
उसे
सुना
है
जान
भी
मेरी
कहीं
इसी
शहर
में
है
Bhaskar Shukla
Send
Download Image
33 Likes
चैन
की
बाँसुरी
बजाइये
आप
शहर
जलता
है
और
गाइये
आप
हैं
तटस्थ
या
कि
आप
नीरो
हैं
असली
सूरत
ज़रा
दिखाइये
आप
Read Full
Gorakh Pandey
Send
Download Image
23 Likes
अब
के
सावन
में
शरारत
ये
मिरे
साथ
हुई
मेरा
घर
छोड़
के
कुल
शहर
में
बरसात
हुई
Gopaldas Neeraj
Send
Download Image
47 Likes
Read More
यूँँही
बे-बाल-ओ-पर
खड़े
हुए
हैं
हम
क़फ़स
तोड़
कर
खड़े
हुए
हैं
दश्त
गुज़रा
है
मेरे
कमरे
से
और
दीवार-ओ-दर
खड़े
हुए
हैं
ख़ुद
ही
जाने
लगे
थे
और
ख़ुद
ही
रास्ता
रोक
कर
खड़े
हुए
हैं
और
कितनी
घुमाओगे
दुनिया
हम
तो
सर
थाम
कर
खड़े
हुए
हैं
बरगुज़ीदा
बुज़ुर्ग
नीम
के
पेड़
थक
गए
हैं
मगर
खड़े
हुए
हैं
मुद्दतों
से
हज़ार-हा
आलम
एक
उम्मीद
पर
खड़े
हुए
हैं
Read Full
Ammar Iqbal
Download Image
5 Likes
कैसे
कैसे
बना
दिए
चेहरे
अपनी
बे-चेहरगी
बनाते
हुए
Ammar Iqbal
Send
Download Image
34 Likes
रात
से
जंग
कोई
खेल
नईं
तुम
चराग़ों
में
इतना
तेल
नईं
आ
गया
हूँ
तो
खींच
अपनी
तरफ़
मेरी
जानिब
मुझे
धकेल
नईं
जब
मैं
चाहूँगा
छोड़
जाऊँगा
इक
सराए
है
जिस्म
जेल
नईं
बेंच
देखी
है
ख़्वाब
में
ख़ाली
और
पटरी
पर
उस
पे
रेल
नईं
जिस
को
देखा
था
कल
दरख़्त
के
गिर्द
वो
हरा
अज़दहा
था
बेल
नईं
Read Full
Ammar Iqbal
Download Image
2 Likes
मैंने
तस्वीर
फेंक
दी
है
मगर
कील
दीवार
में
गड़ी
हुई
है
Ammar Iqbal
Send
Download Image
34 Likes
दिल
आज
शाम
से
ही
उसे
ढूँडने
लगा
कल
जिस
के
बा'द
कमरे
में
तन्हाई
आई
थी
Ammar Iqbal
Send
Download Image
32 Likes
Read More
Bahadur Shah Zafar
Vishal Bagh
Sarvat Husain
Shahzad Ahmad
Hafeez Banarasi
Unknown
Krishna Bihari Noor
Khalid Nadeem Shani
Shahid Zaki
Abbas Tabish
Get Shayari on your Whatsapp
Mazhab Shayari
Protest Shayari
Aashiq Shayari
Partition Shayari
Rang Shayari