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Amit Kumar
meri marzi ka kuchh bhi hua hi nahin
meri marzi ka kuchh bhi hua hi nahin | मेरी मर्ज़ी का कुछ भी हुआ ही नहीं
- Amit Kumar
मेरी
मर्ज़ी
का
कुछ
भी
हुआ
ही
नहीं
पर
मुझे
इसका
कोई
गिला
ही
नहीं
ख़ुद
से
करनी
पड़ी
दोस्ती
एक
दिन
और
कोई
मिरे
पास
था
ही
नहीं
एक
जैसी
ही
है
सोच
सब
की
नए
लोगों
से
मिलने
का
फ़ाइदा
ही
नहीं
अब
जहाँ
भी
है
जैसे
भी
है
ख़ुश
रहे
क्या
हुआ
जो
वो
मेरा
हुआ
ही
नहीं
- Amit Kumar
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आधे
से
आधा
जब
घटा
होगा
वो
मुझे
छोड़
के
गया
होगा
मैं
तो
ये
सोच
होता
हूँ
पागल
क्या
ही
पागल
वो
सोचता
होगा
चैन
की
नींद
सोने
वाला
वो
सोचो
इक
दिन
बहुत
जगा
होगा
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कुछ
इसलिए
उस
में
मिरा
मन
लगता
है
वो
ऐसा
क़ातिल
है
जो
सज्जन
लगता
है
दीवारें
आ
जाती
हैं
भाई
भाई
में
अब
थोड़ी
घर
का
घर
से
आँगन
लगता
है
नाख़ून
इतने
प्यारे
हैं
उसके
कि
वो
जो
घाव
भी
कर
दे
तो
चंदन
लगता
है
जितना
जले
मज़बूत
उतना
होगा
ये
जीवन
किसी
मिट्टी
का
बर्तन
लगता
है
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क्या
है
ये
इश्क़
कोई
बताए
मुझे
भूलता
ही
नहीं
वो
भुलाए
मुझे
उसने
बस
बालों
पे
हाथ
फेरा
है
बस
हो
गए
है
कई
दिन
नहाए
मुझे
नींद
टूटे
न
जब
तक
वो
सपने
में
है
चाहे
चिल्ला
के
कोई
बुलाए
मुझे
सोचता
हूँ
घड़ी
मैं
बनाऊँ
कभी
जो
समय
रहते
सब
कुछ
बताए
मुझे
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नहीं
है
बचा
कुछ
भी
अब
पास
मेरे
चले
जा
चुके
हैं
सभी
ख़ास
मेरे
उसे
याद
मैं
जो
न
रक्खा
करूँँ
तो
नहीं
आती
दुनिया
भी
ये
रास
मेरे
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देखो
मिरी
ज़िंदगी
कैसे
पहेली
बनी
मैंने
उसे
खोया
जो
थी
बस
अकेली
बनी
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