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Amit Kumar
haar jaata hooñ apne hi dar se
haar jaata hooñ apne hi dar se | हार जाता हूँ अपने ही डर से
- Amit Kumar
हार
जाता
हूँ
अपने
ही
डर
से
मुझको
बाहर
न
कर
दे
वो
घर
से
मेरे
जितना
सही
लगता
है
वो
उसको
देखूँ
जो
उसकी
नज़र
से
उम्र
भर
की
भलाई
का
रिश्ता
टूट
जाता
है
झूठी
ख़बर
से
- Amit Kumar
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सताना
रूठ
जाना
और
मनाना
इश्क़
है
लेकिन
अगर
हद
से
ज़ियादा
हो
तो
रिश्ते
टूट
जाते
हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
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ले
आता
हूँ
हर
रिश्ते
को
झगड़े
तक
फिर
झगड़े
से
काम
चलाता
रहता
हूँ
Shariq Kaifi
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तुम्हारा
तो
ख़ुदास
राबता
है
तो
देखो
ना,
हमारे
दुख
बता
कर
Siddharth Saaz
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ज़िंदगी
तुझ
से
भी
क्या
ख़ूब
त'अल्लुक़
है
मिरा
जैसे
सूखे
हुए
पत्ते
से
हवा
का
रिश्ता
Khalish Akbarabadi
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रिश्तों
की
दलदल
से
कैसे
निकलेंगे
हर
साज़िश
के
पीछे
अपने
निकलेंगे
Shakeel Jamali
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बाक़ी
नहीं
रहा
है
कोई
रब्त
शहरस
यानी
कि
ख़ुश
रहेंगे
यहाँ
ख़ुश
रहे
बग़ैर
pankaj pundir
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तो
क्या
ये
हो
नहीं
सकता
कि
तुझ
से
दूर
हो
जाऊँँ
मैं
तुझ
को
भूलने
के
वासते
मजबूर
हो
जाऊँ
सुना
है
टूटने
पर
दिल
सभी
कुछ
कर
गुजरते
हैं
मुझे
भी
तोड़
दो
इतना
कि
मैं
मशहूर
हो
जाऊँ
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SHIV SAFAR
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अंदर
की
दुनिया
से
रब्त
बढ़ाओ
'आनिस'
बाहर
खुलने
वाली
खिड़की
बंद
पड़ी
है
Aanis Moin
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हाथ
छूटें
भी
तो
रिश्ते
नहीं
छोड़ा
करते
वक़्त
की
शाख़
से
लम्हे
नहीं
तोड़ा
करते
Gulzar
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सभी
रिश्तें
मैं
यूँँ
बचाए
हूँ
जैसे
तड़पते
दियों
को
हवा
देते
रहना
Parul Singh "Noor"
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इसलिए
मन
भी
ख़ुद-कुशी
का
था
मसअला
अबकी
ज़िंदगी
का
था
रह
गया
देखो
कितना
तन्हा
अब
शख़्स
वो
ही
जो
हर
किसी
का
था
कोई
बेबस
उदास
कोई
कुछ
हाल
ऐसा
यहाँ
सभी
का
था
वो
मिरा
हो
के
क्या
ही
कर
लेता
ख़ुद
से
ज़्यादा
मैं
तो
उसी
का
था
मैंने
ये
सोच
के
तसल्ली
की
खेल
तो
सारा
कुंडली
का
था
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Amit Kumar
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इश्क़
इक
करना
पर
सही
करना
क्योंकि
अब
आम
है
ठगी
करना
कितनी
ही
बार
करके
देखी
है
यार
मुश्किल
है
ख़ुद-कुशी
करना
जीना
है
सीख
लेना
फिर
दिल
में
कुछ
भी
हो
बात
शरबती
करना
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Amit Kumar
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इस
सोच
में
ही
मेरी
हर
रात
ढल
रही
है
बदले
हैं
लोग
या
फिर
दुनिया
बदल
रही
है
पानी
की
धार
पर
ये
मुझको
लगा
कि
जैसे
इक
सद
में
से
नदी
ये
बाहर
निकल
रही
है
मैं
कैसे
साथ
सबके
अपने
क़दम
मिलाऊँ
दुनिया
मिरी
समझ
से
कुछ
तेज़
चल
रही
है
वो
छाते
ही
अँधेरा
लगता
है
याद
आने
ये
देखो
शाम
भी
अब
जल्दी
से
ढल
रही
है
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Amit Kumar
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आती
है
मुझ
को
ख़ुद
पर
हँसी
ख़ुद
को
रोता
हुआ
सोच
कर
Amit Kumar
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फूल
भी
जब
है
तकता
तुझे
क्यूँ
न
फिर
कहता
अच्छा
तुझे
भूल
जाता
हूँ
ग़म
सारे
मैं
देखता
जब
हूँ
हँसता
तुझे
शूट
साड़ी
भी
फिर
शर्ट
भी
सारा
कुछ
तो
है
जँचता
तुझे
होगा
इतराया
कुछ
तो
ख़ुदा
देखा
जब
होगा
बनता
तुझे
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Amit Kumar
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