maazi ke jab zakham ubharne lagte hain | माज़ी के जब ज़ख़्म उभरने लगते हैं

  - Amit Sharma Meet
माज़ीकेजबज़ख़्मउभरनेलगतेहैं
आँखोंसेजज़्बातबिखरनेलगतेहैं
ज़ेहन-ओ-दिलमेंउसकीयादेंआतेही
लफ़्ज़शरारतख़ुदहीकरनेलगतेहैं
करकेयादतिरेमाथेकाबोसाहम
उँगलीअबहोंठोंपेधरनेलगतेहैं
तेरीमैंतस्वीरकभीजोदेखूँतो
मेरेदिनऔररातठहरनेलगतेहैं
बिनतेरेसाँसोंकीहालतमतपूछो
घुटघुटकररोज़ानामरनेलगतेहैं
हमपरअँधेरेकुछहावीहैंऐसेतो
हमख़ुदकेसाएसेडरनेलगतेहैं
'मीत'कहानीउल्फ़तकीजबपढ़ताहूँ
आँखोंसेकिरदारगुज़रनेलगतेहैं
  - Amit Sharma Meet
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