gham-e-behd men kis ko zabt ka maqdoor hota hai | ग़म-ए-बेहद में किस को ज़ब्त का मक़्दूर होता है

  - Amir Usmani
ग़म-ए-बेहदमेंकिसकोज़ब्तकामक़्दूरहोताहै
छलकजाताहैपैमानाअगरभरपूरहोताहै
कभीऐसाभीहोताहैकिदिलरंजूरहोताहै
मगरइंसानहँसनेकेलिएमजबूरहोताहै
फ़ज़ा-ए-ज़िंदगीकीज़ुल्मतोंकेमर्सिया-ख़्वानो
अँधेरोंहीकेदमसेइम्तियाज़-ए-नूरहोताहै
नहींयेमरहलादोस्तहरबिस्मिलकीक़िस्मतमें
बहुतमुश्किलसेकोईज़ख़्म-ए-दिलनासूरहोताहै
येसइ-ए-ज़ब्त-ए-ग़मआँखोंमेंआँसूरोकनेवाले
सफ़ीनोंमेंकहींतूफ़ानभीमस्तूरहोताहै
  - Amir Usmani
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