na sakat hai zabt-e-gham ki na majaal-e-ashk-baari | न सकत है ज़ब्त-ए-ग़म की न मजाल-ए-अश्क-बारी

  - Amir Usmani
सकतहैज़ब्त-ए-ग़मकीमजाल-ए-अश्क-बारी
येअजीबकैफ़ियतहैसुकूँबे-क़रारी
तिराएकहीसितमहैतिरेहरकरमपेभारी
ग़म-ए-दो-जहाँसेदेदीमुझेतूनेरुस्तगारी
मिरीज़िंदगीकाहासिलतिरेग़मकीपासदारी
तिरेग़मकीआबरूहैमुझेहरख़ुशीसेप्यारी
येक़दमक़दमबलाएँयेसवाद-ए-कू-ए-जानाँ
वोयहींसेलौटजाएजिसेज़िंदगीहोप्यारी
तिरेजाँ-नवाज़वादेमुझेक्याफ़रेबदेते
तिरेकामगईहैमिरीज़ूद-ए'तिबारी
मिरीरातमुंतज़िरहैकिसीऔरसुब्ह-ए-नौकी
येसहरतुझेमुबारकजोहैज़ुल्मतोंकीमारी
  - Amir Usmani
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