apni KHataa ki rakh ke dil zauq-e-khalish na pa sake | अपनी ख़ता कि रख के दिल ज़ौक़-ए-ख़लिश न पा सके

  - Ameer Raza Mazhari
अपनीख़ताकिरखकेदिलज़ौक़-ए-ख़लिशपासके
अक़्लकीझिड़कियाँसहींपरफ़रेबखासके
हिज्रभीएकवहमहैवस्लभीइकफ़रेबथा
खोकेतुमकोखोसकेपाकेतुमकोपासके
तेरीनज़रनेबज़्ममेंउठकेहमेंबिठादिया
उट्ठेतोबारबारहमउठकेमगरजासके
जुरअत-ए-तर्क-ए-आशिक़ीमुझसेहोसकीकभी
अपनेकोआज़मालियातुमकोआज़मासके
कहतेहैंमा'रिफ़तजिसेवोभीहैए'तिराफ़-ए-इज्ज़
उसकोख़ुदासमझलियाजोसमझमेंसके
इश्क़उसीकामुस्तनदशौक़उसीकामो'तबर
तेरीनिगाहसेभीजोराज़-ए-नज़रछुपासके
बसइसीतल्ख़यादपरख़त्महैदास्तान-ए-दिल
तुमनेहमेंभुलादियाहमतुम्हेंभुलासके
आएवोमय-कदेमेंक्यूँउसकीजगहहरममेंहै
आँखबचाकेजोपिएपीकेलड़खड़ासके
वोजोहैबंदा-ए-वफ़ाकहतेहैंसबजिसे'रज़ा'
उसकीभलामजालक्यातुमसेनज़रमिलासके
  - Ameer Raza Mazhari
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