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Ambar
baat hogii berookhi se kab talak
baat hogii berookhi se kab talak | बात होगी बेरुख़ी से कब तलक
- Ambar
बात
होगी
बेरुख़ी
से
कब
तलक
कोई
रूठे
ज़िन्दगी
से
कब
तलक
इक
न
इक
दिन
वो
भी
समझेगा
मुझे
ये
कहूँ
मैं
हर
किसी
से
कब
तलक
ये
ज़माना
और
भी
कुछ
माँगे
है
हो
गुज़ारा
आशिक़ी
से
कब
तलक
बात
तो
करनी
ही
होगी
एक
दिन
चुप
रहोगे
ख़ामुशी
से
कब
तलक
जिस्म-ओ-जाँ
इक
दिन
मेरी
लुट
जाएगी
यूँँ
ही
जीऊँ
बे-दिली
से
कब
तलक
- Ambar
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उम्र
भर
मेरी
उदासी
के
लिए
काफ़ी
है
जो
सबब
मेरी
ख़मोशी
के
लिए
काफ़ी
है
जान
दे
देंगे
अगर
आप
कहेंगे
हम
सेे
जान
देना
ही
मु'आफ़ी
के
लिए
काफ़ी
है
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Aakash Giri
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उसे
बेचैन
कर
जाऊँगा
मैं
भी
ख़मोशी
से
गुज़र
जाऊँगा
मैं
भी
Ameer Qazalbash
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ख़मोशी
मेरी
मअनी-ख़ेज़
थी
ऐ
आरज़ू
कितनी
कि
जिस
ने
जैसा
चाहा
वैसा
अफ़्साना
बना
डाला
Arzoo Lakhnavi
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तकल्लुफ़
छोड़कर
आओ
उसे
फिर
से
जिया
जाए
हमारा
बचपना
जो
एल्बमों
में
क़ैद
रहता
है
Shiva awasthi
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हम
त'अल्लुक़
जिसे
समझते
थे
वो
त'अल्लुक़
नहीं
तकल्लुफ़
था
Akash Rajpoot
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ग़लत
बातों
को
ख़ामोशी
से
सुनना
हामी
भर
लेना
बहुत
हैं
फ़ाएदे
इस
में
मगर
अच्छा
नहीं
लगता
Javed Akhtar
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बुरा
मनाया
था
हर
आहट
हर
सरगोशी
का
सोचो
कितना
ध्यान
रखा
उसने
ख़ामोशी
का
तुम
इसका
नुक़सान
बताती
अच्छी
लगती
हो
वरना
हम
को
शौक़
नहीं
है
सिगरेट-नोशी
का
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Khurram Afaq
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मेरे
मिज़ाज
की
उसको
ख़बर
नहीं
रही
है
ये
बात
मेरे
गले
से
उतर
नहीं
रही
है
ये
रोने-धोने
का
नाटक
तवील
मत
कर
अब
बिछड़
भी
जाए
तू
मुझ
सेे
तो
मर
नहीं
रही
है
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Ashutosh Vdyarthi
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ग़लत
बातों
को
ख़ामोशी
से
सुनना
हामी
भर
लेना
बहुत
हैं
फ़ाएदे
इस
में
मगर
अच्छा
नहीं
लगता
Javed Akhtar
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ख़ामुशी
से
हुई
फ़ुग़ाँ
से
हुई
इब्तिदा
रंज
की
कहाँ
से
हुई
Ada Jafarey
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जब
भी
कोई
सच्चा
'आशिक़
रोता
है
सच
कहता
हूँ
याद
तुम्हारी
आती
है
Ambar
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करना
जो
था
वो
कर
नहीं
पाया
मैं
तो
मर
के
भी
मर
नहीं
पाया
आज
भी
उसको
याद
करता
हूँ
क्यूँ
मैं
अब
तक
सुधर
नहीं
पाया
जो
तमन्ना
उगाई
थी
हमने
बस
वही
इक
शजर
नहीं
पाया
ख़ाक
छानी
ज़माने
की
लेकिन
एक
तेरा
ही
दर
नहीं
पाया
वो
बुरा
लाख
था
मगर
वो
शख़्स
दिल
से
मेरे
उतर
नहीं
पाया
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हमेशा
यही
भूल
करता
रहा
तेरा
साथ
पाने
को
मरता
रहा
सुनहरे
बहारों
के
मौसम
तले
गुलिस्ताँ
हमारा
बिखरता
रहा
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गर
मिल
जाती
उल्फ़त
भी
यूँँ
सस्ते
में
फ़र्क
न
पड़ता
मुझको
तुझ
बिन
रहने
में
मेरे
कारण
कभी
नहीं
तू
रोएगा
ये
भी
तो
शामिल
था
तेरे
वादे
में
बुरा
किसी
इंसान
को
कहने
से
पहले
शक़्ल
भी
अपनी
देख
लिया
कर
शीशे
में
गर
मिल
जाओ
दिल
की
बातें
चार
करें
लेकिन
हम
सेे
मिलना
कहीं
अकेले
में
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तुझ
को
दिल
में
बसा
के
रक्खा
है
दूरियों
को
मिटा
के
रक्खा
है
जब
सुना
चाँद
आने
वाला
है
दीप
घर
का
बुझा
के
रक्खा
है
जाल
उसने
बिछा
के
रक्खा
है
रुख़
से
सब
को
लुभा
के
रक्खा
है
जब
गया
तू
मुझे
अकेला
छोड़
तब
से
दिल
को
दुखा
के
रक्खा
है
क्या
हुआ
है
तुझे
मोहब्बत
में
हाल
कैसा
बना
के
रक्खा
है
हाँ
या
ना
में
जवाब
दे
दे
अब
ख़ामख़ा
ही
फँसा
के
रक्खा
है
हाल
भी
तो
बता
दे
अपना
तू
मैं
बिज़ी
हूँ
बता
के
रक्खा
है
मानता
क्यूँँ
नहीं
तू
मेरी
बात
काहे
इतना
सता
के
रक्खा
है
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