phir tiri yaadon ki funkaron ke beech | फिर तिरी यादों की फुंकारों के बीच

  - Alok Mishra
फिरतिरीयादोंकीफुंकारोंकेबीच
नीम-जाँहैरातयल्ग़ारोंकेबीच
ऊँघतारहताहैअक्सरमाहताब
रातभरहमचंदबे-दारोंकेबीच
गूँजतीरहतीहैमुझमेंदम-ब-दम
चीख़जोउभरीकोहसारोंकेबीच
देखताआख़िरमैंउसकोकिसतरह
रौशनीकीतेज़बौछारोंकेबीच
खोहीजाताहूँतिरेक़िस्सेमेंमैं
बारहागुमनामकिरदारोंकेबीच
एकअदनासादियाहैआफ़्ताब
मेरेमनकेगहरेअँधियारोंकेबीच
क़ैदसेअपनीनिकलतेक्यूँँनहीं
ज़ख़्मकबभरतेहैंदीवारोंकेबीच
सानेहेछपनेलगेहैंआँखोंमें
नब्ज़थमजाएअख़बारोंकेबीच
थामहावटऔरफिरजुड़वाँबहाव
बहगयामैंगुनगुनेधारोंकेबीच
  - Alok Mishra
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