gulon ki chaah men tauheen-e-berg-o-baar na kar | गुलों की चाह में तौहीन-ए-बर्ग-ओ-बार न कर

  - Ali Jawwad Zaidi
गुलोंकीचाहमेंतौहीन-ए-बर्ग-ओ-बारकर
भरेचमनमेंयेसामान-ए-इंतिशारकर
ख़िज़ाँरियाज़-ए-चमनहैख़िज़ाँगुदाज़-ए-चमन
ख़िज़ाँकाडरहोतोफिरख़्वाहिश-ए-बहारकर
बसएकदिलहैयहाँवाक़िफ़-ए-नशेब-ओ-फ़राज़
वफ़ाकीराहमेंरहबरकाइंतिज़ारकर
हुजूम-ए-ग़ममेंतबस्सुमकाखेलदेखलिया
मैंकहरहाथामिरेग़मकाए'तिबारकर
कहायेइश्क़सेदार-ओ-सलीब-ए-ज़िंदाँने
मजालहोतोमिरीराहइख़्तियारकर
येताज़ाताज़ाक़फ़सक्याख़िज़ाँसेकुछकमहैं
हुजूम-ए-गुलहीसेअंदाज़ा-ए-बहारकर
नसीम-ए-सुब्हउन्हेंमुस्कुरातोलेनेदे
अभीगुलोंसेकोईज़िक्र-ए-नागवारकर
उधरहरएकनज़रमेंहैहसरतोंकाजुलूस
इधरयेहुक्म-ए-हयाहैनिगाहेंचारकर
येपूछनाहैकिसीदिनजनाब-ए-'ज़ैदी'से
किआपनेतोकहाथाकिसीसेप्यारकर
  - Ali Jawwad Zaidi
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