pesh har ahd ko ik teg ka imkaan kyun hai | पेश हर अहद को इक तेग़ का इम्काँ क्यूँँ है

  - Ali Akbar Abbas
पेशहरअहदकोइकतेग़काइम्काँक्यूँँहै
हरनयादौरनएख़ौफ़मेंग़लताँक्यूँँहै
शहरकेशहरहीबेहोशपड़ेपूछतेहैं
ज़िंदगीअपनेअमल-दारोंसेनालाँक्यूँँहै
आइनाअक्समोअ'त्तलतोनहींकरताकभी
इतनाबे-आबमगरआईना-ए-जाँक्यूँँहै
फिरसेमतलूब-ए-ख़लाइक़हैगवाहीकोई
बर-सर-ए-कोह-ए-सियहशोला-ए-लरज़ाँक्यूँँहै
येअमलहैख़स-ओ-ख़ाशाककीछिदराईका
रंग-ए-रंगीन-ए-गुल-ओ-लालापरेशाँक्यूँँहै
  - Ali Akbar Abbas
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