jab kabhi tark-e-gham-e-dil ka sawaal aata hai | जब कभी तर्क-ए-ग़म-ए-दिल का सवाल आता है

  - Ali Abbas Ummeed
जबकभीतर्क-ए-ग़म-ए-दिलकासवालआताहै
रेतपरनामथामेराभीख़यालआताहै
मौज-ए-तूफ़ानउठीबहचलेख़्वाबोंकेसदफ़
फिरबरसतेहुएबादलपेज़वालआताहै
अबमिरेख़्वाबकेहमराहवहीयादेंहैं
जिनकोमा'लूमथाशीशेमेंबालआताहै
जबसिमटआयाहैख़ुदजिस्महीपेशानीपर
क्यूँदर-ए-दिलपेदबेपाँवमलालआताहै
क्यातिराज़ेहनभीलम्होंकेसफ़रमेंहोगा
तेरीबारातमेंरहरहकेख़यालआताहै
कोईऐसाभीहैजोनक़्श-ब-दीवारहो
अबयेता'मीरकीराहोंमेंसवालआताहै
घंटियाँवक़्तकीबजतीहैंमुसलसल'उम्मीद'
फ़ासलेकहतेहैंइकऔरभीसालआताहै
  - Ali Abbas Ummeed
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