uljhe na ishq se kaho dair-o-haram se kya garz | उलझे न इश्क़ से कहो दैर-ओ-हरम से क्या ग़रज़

  - Al-Haaj Al-Hafiz
उलझेइश्क़सेकहोदैर-ओ-हरमसेक्याग़रज़
पीर-ए-मुग़ाँसेकामक्यानक़्श-ए-क़दमसेक्याग़रज़
अपनेशरीकभीनहींग़ैरोंकोहमसेक्याग़रज़
सचहैकिसीकोसोज़-ए-दिलदीदा-ए-नमसेक्याग़रज़
सुनलोमरीज़-ए-इश्क़काअबतोइलाजहोचुका
ख़ुदहीमसीहाजबकहेऐसेकोदमसेक्याग़रज़
पेशाहोजिसकाकीना-ओ-जौर-ओ-जफ़ातोहैबजा
जल्वा-फ़गनहोकिसलिएमेहर-ओ-करमसेक्याग़रज़
सदक़ेहज़ारबारहुएकहनेपेजिसकेमर-मिटे
फिरभीवोमिरेहुएकहतेहैंहमसेक्याग़रज़
महफ़िल-ए-दिलरुबामेंक्यूँचर्चामिराकोईकरे
मेरेरक़ीबकोमिरेरंज-ओ-अलमसेक्याग़रज़
जाम-ए-शराबकौनदेरिंदोंकोअपनीहैपड़ी
ख़ुमसेलगेहैंशैख़जीसाक़ीकोहमसेक्याग़रज़
कोईबुलानेआएक्यूँघरसेहमेंलेजाएक्यूँ
पीर-ए-मुग़ाँतोहमनहींरिंदोंकोहमसेक्याग़रज़
ज़ाहिद-ए-सादा-लौहक्यूँतक़वेपेतुझकोनाज़यूँँ
तेरेख़ुदाकोना-समझतौफ़-ए-हरमसेक्याग़रज़
  - Al-Haaj Al-Hafiz
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