tum se chhut kar zindagi ka naqsh-e-paa milta nahin | तुम से छुट कर ज़िंदगी का नक़्श-ए-पा मिलता नहीं

  - Akhtar Saeed Khan
तुमसेछुटकरज़िंदगीकानक़्श-ए-पामिलतानहीं
फिररहाहूँकू-ब-कूअपनापतामिलतानहीं
मैंहूँयाफिरताहैकोईऔरमेरेभेसमें
किससेपूछूँकोईसूरत-आश्नामिलतानहीं
नक़्श-ए-हैरतहीथापुर्सान-ए-हाल-ए-ग़मभीथा
तुमनेजोतोड़ाहैअबवोआईनामिलतानहीं
ना-उमीदीहर्फ़-ए-तोहमतहीसहीक्याकीजिए
तुमक़रीबआतेनहींहोऔरख़ुदामिलतानहीं
उसकेदिलसेअपनाअंदाज़-ए-तग़ाफ़ुलपूछिए
जिसकेदिलकोदर्दकाभीआसरामिलतानहीं
इकइकरिश्ताइसीदुनियासेथाअपनाकभी
सोचताहूँऔरकोईसिलसिलामिलतानहीं
कोईसाएकीतरहचलताहै'अख़्तर'साथसाथ
दोस्तदार-ए-दिलहैलेकिनबरमलामिलतानहीं
  - Akhtar Saeed Khan
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