maal-e-gardish-e-lail-o-nahaar kuchh bhi nahin | मआल-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार कुछ भी नहीं

  - Akhtar Saeed Khan
मआल-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहारकुछभीनहीं
हज़ारनक़्शहैंऔरआश्कारकुछभीनहीं
हरएकमोड़पेदुनियाकोहमनेदेखलिया
सिवाएकश्मकश-ए-रोज़गारकुछभीनहीं
निशान-ए-राहमिलेभीयहाँतोकैसेमिले
सिवाएख़ाक-ए-सर-ए-रहगुज़ारकुछभीनहीं
बहुतक़रीबरहीहैयेज़िंदगीहमसे
बहुतअज़ीज़सहीए'तिबारकुछभीनहीं
बनपड़ाकिगरेबाँकेचाकसीलेते
शुऊ'रहोकिजुनूँइख़्तियारकुछभीनहीं
खिलेजोफूलवोदस्त-ए-ख़िज़ाँनेछीनलिए
नसीब-ए-दामन-ए-फ़स्ल-ए-बहारकुछभीनहीं
ज़मानाइश्क़केमारोंकोमातक्यादेगा
दिलोंकेखेलमेंयेजीतहारकुछभीनहीं
येमेराशहरहैमैंकैसेमानलूँ'अख़्तर'
रस्म-ओ-राहवोकू-ए-यारकुछभीनहीं
  - Akhtar Saeed Khan
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