jun fauj ki maftooh ho zanjeer men aave | जूँ फ़ौज कि मफ़्तूह हो ज़ंजीर में आवे

  - Akhtar Saeed
जूँफ़ौजकिमफ़्तूहहोज़ंजीरमेंआवे
अल्फ़ाज़कालश्करमिरीतहरीरमेंआवे
इकख़ासइनायतहैकिदेतेनहींमुझको
वोदर्दकिजोपंजा-ए-तदबीरमेंआवे
यकसररग-ए-मंसूरकीहिम्मतसेपरेहै
वोइल्मकिइकअर्सा-ए-तक़तीरमेंआवे
जोचाहेभरेमैंनेमुसव्विरसेकहाथा
कुछरंग-ए-मोहब्बतमिरीतस्वीरमेंआवे
वोबातख़ुशादेताहैदिलजिसकीगवाही
येक्याकिकहोअगलीअसातीरमेंआवे
जोहुक्मतुम्हाराहैवोवाजिबहैबिला-शक
जोअर्ज़हमारीहैवोता'ज़ीरमेंआवे
हैगरचेबहुतमेरेलिएख़्वाबकीदुनिया
कुछऔरमज़ाख़्वाबकीता'बीरमेंआवे
जिसपासमुदावानहींकुछआब-ओ-हवाका
लाज़िमहैमिरेहल्क़ा-ए-तक़रीरमेंआवे
मुमकिननहींआदमकेलिएशान-ए-ख़ुदाई
हाँयूँँकिमगरआया-ए-ततहीरमेंआवे
  - Akhtar Saeed
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