shaakhon pe zakham hain ki shagoofe khile hue | शाख़ों पे ज़ख़्म हैं कि शगूफ़े खिले हुए

  - Akhtar Hoshiyarpuri
शाख़ोंपेज़ख़्महैंकिशगूफ़ेखिलेहुए
अबकेफ़रोग़-ए-गुलकेअजबसिलसिलेहुए
ख़ुर्शीदकाजमालकिसेहोसकानसीब
तारोंकेडूबतेहीरवाँक़ाफ़िलेहुए
अपनाहीध्यानऔरकहींथानज़रकहीं
वर्नाथेराहमेंगुल-ओ-ग़ुंचेखिलेहुए
तुममुतमइनरहोकिदेखेंकुछकहें
आँखोंकेसाथसाथहैंलबभीसिलेहुए
मानाकिसीकादर्दग़म-ए-ज़िंदगीनहीं
फिरभीकिसीकेदर्दसेक्याक्यागिलेहुए
जोसाँसकेमसहुएवोमंज़िलेंनहीं
लम्हेजोहमपेबीतगएफ़ासलेहुए
'अख़्तर'मुझेयेडरहैकिदामनजलउठे
पाताहूँआँसुओंमेंशरारेमिलेहुए
  - Akhtar Hoshiyarpuri
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