jab gham-e-dost rag-o-pai men samaa jaata hai | जब ग़म-ए-दोस्त रग-ओ-पै में समा जाता है

  - Akhtar Gwaliori
जबग़म-ए-दोस्तरग-ओ-पैमेंसमाजाताहै
तबकहींजाकेदु'आओंमेंअसरआताहै
दिलमिराजबभीशब-ए-तारसेघबराताहै
शम्अ'सीकेकोईदिलमेंजलाजाताहै
सोचताहूँकितिरादर्दखोजाएकहीं
अबतोहरग़ममिरीतन्हाईसेटकराताहै
तुमनहींवोभीनहींवोभीनहींवोभीनहीं
कौनहैफिरजोग़रीबोंपेसितमढाताहै
धूपहीठीकहैइसछाँवसेजोग़मकरदे
कमसेकमधूपमेंसायातोनज़रआताहै
रातकेबादहीआतीहैसहरयारो
ग़मजिसेमिलतेहैंराहतभीवहीपाताहै
लोगकहतेहैंकभीपीकेतोदेखो'अख़्तर'
गर्मी-ए-मयसेहरइकदर्दपिघलजाताहै
  - Akhtar Gwaliori
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