na raaz-e-ibtida samjho na raaz-e-intiha samjho | न राज़-ए-इब्तिदा समझो न राज़-ए-इंतिहा समझो

  - Akhtar Ansari Akbarabadi
राज़-ए-इब्तिदासमझोराज़-ए-इंतिहासमझो
नज़रवालोंतुम्हेंकरनाहैअबदुनियामेंक्यासमझो
तलबमेंसिद्क़हैतोएकदिनमंज़िलपेपहुँचोगे
क़दमआगेबढ़ाओख़ुदकोअपनारहनुमासमझो
येक्याअंदाज़हैइतनागुरेज़अहल-ए-तमन्नासे
ख़ुदातौफ़ीक़देतोअहल-ए-दिलकामुद्दआसमझो
तुम्हारेहरइशारेपरसर-ए-तस्लीमख़मलेकिन
गुज़ारिशहैकिजज़्बात-ए-मोहब्बतकोज़रासमझो
होकोईमौज-ए-तूफ़ाँयाहवा-ए-तुंदकाझोंका
जोपहुँचादेलब-ए-साहिलउसीकोनाख़ुदासमझो
जिसेदेखोवहीबदमस्तहीमग़रूरहैहमदम
कोईबंदानहींदुनियामेंकिसकिसकोख़ुदासमझो
यहाँरहबरकेपर्देमेंबहुतरहज़नहैं'अख़्तर'
रहोदूरउससेतुमजिसकोवफ़ाना-आश्नासमझो
  - Akhtar Ansari Akbarabadi
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