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AKASH
samundar jaisi aañkhen uski dekheen jab
samundar jaisi aañkhen uski dekheen jab | समुंदर जैसी आँखें उसकी देखीं जब
- AKASH
समुंदर
जैसी
आँखें
उसकी
देखीं
जब
हमें
क्यूँ
दी
है
बीनाई
समझ
आई
- AKASH
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ज़िन्दगी
पर
लिख
दिया
था
नाम
मैंने
राम
का
और
फिर
दुख
के
समुंदर
पार
सारे
हो
गए
Tanoj Dadhich
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मेरे
जुनूँ
का
नतीजा
ज़रूर
निकलेगा
इसी
सियाह
समुंदर
से
नूर
निकलेगा
Ameer Qazalbash
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क्या
दुख
है
समुंदर
को
बता
भी
नहीं
सकता
आँसू
की
तरह
आँख
तक
आ
भी
नहीं
सकता
तू
छोड़
रहा
है
तो
ख़ता
इस
में
तेरी
क्या
हर
शख़्स
मेरा
साथ
निभा
भी
नहीं
सकता
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Waseem Barelvi
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बातचीत
में
आला
हो
बस
ठीक
न
हो
फ़ाइदा
क्या
महबूब
अगर
बारीक
न
हो
हम
तेरी
क़ुर्बत
में
अक्सर
सोचते
हैं
दरिया
खेत
के
इतना
भी
नज़दीक
न
हो
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Khurram Afaq
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मुतअस्सिर
हैं
यहाँ
सब
लोग
जाने
क्या
समझते
हैं
नहीं
जो
यार
शबनम
भी
उसे
दरिया
समझते
हैं
हक़ीक़त
सारी
तेरी
मैं
बता
तो
दूँ
सर-ए-महफ़िल
मगर
ये
लोग
सारे
जो
तुझे
अच्छा
समझते
हैं
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Nirvesh Navodayan
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हम
भी
दरिया
हैं
हमें
अपना
हुनर
मालूम
है
जिस
तरफ़
भी
चल
पड़ेंगे
रास्ता
हो
जाएगा
Bashir Badr
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ये
इश्क़
नहीं
आसाँ
इतना
ही
समझ
लीजे
इक
आग
का
दरिया
है
और
डूब
के
जाना
है
Jigar Moradabadi
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बड़े
बूढों
के
घर
को
अब
जो
बच्चे
छोड़
देते
हैं
समुंदर
साहिलों
तक
आ
के
रस्ता
मोड़
देते
हैं
वसीयत
में
कोई
भी
दस्तख़त
जाली
नहीं
होता
ये
पूरे
होश
में
अपने
ही
घर
को
तोड़
देते
हैं
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anupam shah
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दरिया
के
किनारे
पे
मिरी
लाश
पड़ी
थी
और
पानी
की
तह
में
वो
मुझे
ढूँड
रहा
था
Adil Mansuri
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तिरे
एहसास
में
डूबा
हुआ
मैं
कभी
सहरा
कभी
दरिया
हुआ
मैं
Siraj Faisal Khan
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आती
नहीं
अब
याद
भी
होते
नहीं
नाशाद
भी
तूने
लगाए
ज़ख़्म
थे
तो
तू
लगाती
खाद
भी
हैं
आपके
बर्बाद
गर
हैं
आपके
आबाद
भी
कहने
लगे
हैं
झूट
अब
मिलने
लगी
है
दाद
भी
थे
मज़हबी
इतने
नहीं
हम
थे
कभी
फ़रहाद
भी
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AKASH
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बस
निकलता
ही
नहीं
है
दम
हमारा
तुम
समझ
सकते
नहीं
हो
ग़म
हमारा
हो
गया
है
हक़
अब
उस
पर
दूसरों
का
मिट
गया
है
यार
अब
परचम
हमारा
अब
सितारे
पूछते
हैं
रोज़
मुझ
सेे
कब
करेगा
चाँद
ये
चम
चम
हमारा
फोल्डर
इक
याद
का
अब
है
मिटाना
हैंग
करता
है
बहुत
सिस्टम
हमारा
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AKASH
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नयन
में
आप
के
जीवन
बिताना
है
मुझे
स्पेस
स्टेशन
बनाना
है
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नाम
तेरा
गुन-गुनाता
जा
रहा
हूँ
तीरगी
को
मैं
मिटाता
जा
रहा
हूँ
लुत्फ़
आता
है
उदासी
में
मुझे
अब
हर
ख़ुशी
में
ग़म
मिलाता
जा
रहा
हूँ
छोड़ने
आया
नहीं
है
कोइ
मुझको
हाथ
मैं
किसको
हिलाता
जा
रहा
हूँ
बज
रहे
हैं
रात
के
दो
मैं
मुसलसल
गीत
नुसरत
के
बजाता
जा
रहा
हूँ
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मुहब्बत
का
नया
इक
सीन
करते
हैं
कहाँ
हम
ज़ीस्त
अब
ग़मगीन
करते
हैं
तेरे
बेरंग
मौसम
याद
आते
हैं
मुझे
किस
होंठ
जब
रंगीन
करते
हैं
हमारे
दोस्तों
की
ख़ासियत
है
ये
हमारी
वो
बहुत
तौहीन
करते
हैं
मुझे
वो
देखकर
के
थे
कभी
कहते
मेरे
दिल
में
सदा
शाहीन
करते
हैं
लगे
आसान
राहें
हर
मुसाफ़िर
को
यही
हम
सोच
रस्ते
क्लीन
करते
हैं
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