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Arihant jain
is rang-e-lahu se tu kya tees milaata hai
is rang-e-lahu se tu kya tees milaata hai | इस रंग-ए-लहू से तू, क्या टीस मिलाता है
- Arihant jain
इस
रंग-ए-लहू
से
तू,
क्या
टीस
मिलाता
है
हर
बार
नतीजा
भी,
नीयत
से
नहीं
मिलता
- Arihant jain
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मसअला
ख़त्म
हुआ
चाहता
है
दिल
बस
अब
ज़ख़्म
नया
चाहता
है
Shakeel Jamali
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यही
अंजाम
अक्सर
हम
ने
देखा
है
मोहब्बत
का
कहीं
राधा
तरसती
है
कहीं
कान्हा
तरसता
है
Virendra Khare Akela
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फ़र्क़
इतना
है
कि
तू
पर्दे
में
और
मैं
बे-हिजाब
वर्ना
मैं
अक्स-ए-मुकम्मल
हूँ
तिरी
तस्वीर
का
Asad Bhopali
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भरे
हुए
जाम
पर
सुराही
का
सर
झुका
तो
बुरा
लगेगा
जिसे
तेरी
आरज़ू
नहीं
तू
उसे
मिला
तो
बुरा
लगेगा
ये
आख़िरी
कंपकंपाता
जुमला
कि
इस
तअ'ल्लुक़
को
ख़त्म
कर
दो
बड़े
जतन
से
कहा
है
उस
ने
नहीं
किया
तो
बुरा
लगेगा
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Zubair Ali Tabish
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इसी
लिए
तो
यहाँ
अब
भी
अजनबी
हूँ
मैं
तमाम
लोग
फ़रिश्ते
हैं
आदमी
हूँ
मैं
Bashir Badr
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तुम्हारे
ख़त
में
नया
इक
सलाम
किसका
था
न
था
रक़ीब
तो
आख़िर
वो
नाम
किसका
था
Dagh Dehlvi
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घर
की
इस
बार
मुकम्मल
मैं
तलाशी
लूँगा
ग़म
छुपा
कर
मिरे
माँ
बाप
कहाँ
रखते
थे
Unknown
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चलो
माना
कि
रोना
मसअले
का
हल
नहीं
लेकिन
करे
भी
क्या
कोई
जब
ख़त्म
हर
उम्मीद
हो
जाए
Bhaskar Shukla
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या'नी
कि
इश्क़
अपना
मुकम्मल
नहीं
हुआ
गर
मैं
तुम्हारे
हिज्र
में
पागल
नहीं
हुआ
वो
शख़्स
सालों
बाद
भी
कितना
हसीन
है
वो
रंग
कैनवस
पे
कभी
डल
नहीं
हुआ
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Kushal Dauneria
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अजीब
दर्द
का
रिश्ता
था
सब
के
सब
रोए
शजर
गिरा
तो
परिंदे
तमाम
शब
रोए
Tariq Naeem
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गाँव
के
जितने
दीए
थे
शहर
जा
रौशन
हुए
रौशनी
को
देख
कैसे
खींचती
है
रौशनी
Arihant jain
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भुलाकर
रंज
क़ातिल
से
भी
अपना
आश्ना
देखें?
बड़ा
मुश्किल
है
आतिश
आब
में
अपना
ख़ुदा
देखें
कई
मल्लाह
दरिया
में
है
अपनी
छानते
नेकी
तो
अब
तिनके
के
जिम्में
है
किसी
को
डूबता
देखें
ज़रूरत
आम
सी
शय
की
कहीं
वहशत
न
बन
जाए
कोई
हैरत
नहीं
गर
अब्र
में
सहरा
नशा
देखे
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Arihant jain
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रौंद
कर
जो
कुछ
गया
हूँ
साथ
नक्श-ए-पा
में
है
जुड़
गया
है
दर्द
मुस्तक़बिल
में
मेरे
जुर्म
का
Arihant jain
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मुकद्दर
से
नहीं
ज़्यादा
जुटा
सकता
तमन्नाएँ
तू
लकड़ी
पेड़
में
जितनी
है
उतनी
काट
सकता
है
Arihant jain
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बड़ा
मुश्किल
है,
मुश्किल
में,
तेरे
हक़
में
सदा
देगी
ख़िजाँ
में
हर
बचे
पत्ते
को
ये
दुनिया
हवा
देगी
Arihant jain
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