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Arihant jain
gaav ke jitne diye the shahar ja raushan hue
gaav ke jitne diye the shahar ja raushan hue | गाँव के जितने दीए थे शहर जा रौशन हुए
- Arihant jain
गाँव
के
जितने
दीए
थे
शहर
जा
रौशन
हुए
रौशनी
को
देख
कैसे
खींचती
है
रौशनी
- Arihant jain
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अब
के
सावन
में
शरारत
ये
मिरे
साथ
हुई
मेरा
घर
छोड़
के
कुल
शहर
में
बरसात
हुई
Gopaldas Neeraj
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चैन
की
बाँसुरी
बजाइये
आप
शहर
जलता
है
और
गाइये
आप
हैं
तटस्थ
या
कि
आप
नीरो
हैं
असली
सूरत
ज़रा
दिखाइये
आप
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Gorakh Pandey
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रोज़
बस्ते
हैं
कई
शहर
नए
रोज़
धरती
में
समा
जाते
हैं
Kaifi Azmi
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बे
तेरे
क्या
वहशत
हम
को
तुझ
बिन
कैसा
सब्र-ओ-सुकूँ
तू
ही
अपना
शहर
है
जानी
तू
ही
अपना
सहरा
है
Ibn E Insha
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आदत
सी
बना
ली
है
तुमने
तो
'मुनीर'
अपनी
जिस
शहर
में
भी
रहना
उकताए
हुए
रहना
Muneer Niyazi
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कोई
हाथ
भी
न
मिलाएगा
जो
गले
मिलोगे
तपाक
से
ये
नए
मिज़ाज
का
शहर
है
ज़रा
फ़ासले
से
मिला
करो
Bashir Badr
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सुना
है
लोग
उसे
आँख
भर
के
देखते
हैं
सो
उस
के
शहर
में
कुछ
दिन
ठहर
के
देखते
हैं
Ahmad Faraz
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नक़्शा
उठा
के
और
कोई
शहर
देखिए
इस
शहर
में
तो
सब
से
मुलाक़ात
हो
गई
Nida Fazli
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शहर-वालों
की
मोहब्बत
का
मैं
क़ायल
हूँ
मगर
मैंने
जिस
हाथ
को
चूमा
वही
ख़ंजर
निकला
Ahmad Faraz
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तेरी
आवाज़
को
इस
शहर
की
लहरें
तरसती
हैं
ग़लत
नंबर
मिलाता
हूँ
तो
पहरों
बात
होती
है
Ghulam Mohammad Qasir
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भुलाकर
रंज
क़ातिल
से
भी
अपना
आश्ना
देखें?
बड़ा
मुश्किल
है
आतिश
आब
में
अपना
ख़ुदा
देखें
कई
मल्लाह
दरिया
में
है
अपनी
छानते
नेकी
तो
अब
तिनके
के
जिम्में
है
किसी
को
डूबता
देखें
ज़रूरत
आम
सी
शय
की
कहीं
वहशत
न
बन
जाए
कोई
हैरत
नहीं
गर
अब्र
में
सहरा
नशा
देखे
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Arihant jain
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मुकद्दर
से
नहीं
ज़्यादा
जुटा
सकता
तमन्नाएँ
तू
लकड़ी
पेड़
में
जितनी
है
उतनी
काट
सकता
है
Arihant jain
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बाग
से
हर
बार
केवल
फूल
ही
हमने
चुने
और
कांटे,
और
तीखे,
और
तीखे
हो
गए
Arihant jain
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रौंद
कर
जो
कुछ
गया
हूँ
साथ
नक्श-ए-पा
में
है
जुड़
गया
है
दर्द
मुस्तक़बिल
में
मेरे
जुर्म
का
Arihant jain
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बड़ा
मुश्किल
है,
मुश्किल
में,
तेरे
हक़
में
सदा
देगी
ख़िजाँ
में
हर
बचे
पत्ते
को
ये
दुनिया
हवा
देगी
Arihant jain
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