mila jo dhoop ka sehra badan shajar na banaa | मिला जो धूप का सहरा बदन शजर न बना

  - Ahmad Ziya
मिलाजोधूपकासहराबदनशजरबना
मैंवोहूँख़ुदजोकभीअपनाहम-सफ़रबना
नगरनगरमेंनईबस्तियाँबसाईगईं
हज़ारचाहामगरफिरभीअपनाघरबना
येबातबातहैदिलकीतोफिरझिजककैसी
येनक़्शनक़्श-ए-वफ़ाहैतूसोचकरबना
चमकतेदिनकेउजालोंसेआश्नाहोकर
अँधेरीरातमेंसाएकोहम-सफ़रबना
  - Ahmad Ziya
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