siyaah raat ki har dilkashi ko bhool ga.e | सियाह रात की हर दिलकशी को भूल गए

  - Ahmad Zafar
सियाहरातकीहरदिलकशीकोभूलगए
दिएजलाकेहमींरौशनीकोभूलगए
किसीकलीकेतबस्सुमनेबेकलीदीहै
कलीहँसीतोहमअपनीहँसीकोभूलगए
जहाँमेंऔररह-ओ-रस्म-ए-आशिक़ीक्याहै
फ़रेब-ख़ुर्दातिरीबे-रुख़ीकोभूलगए
यहीहैशेवा-ए-अहल-ए-वफ़ाज़मानेमें
किसीकोदिलसेलगायाकिसीकोभूलगए
ज़रासीबातपेदामनछुड़ालियाहमसे
तमामउम्रकीवाबस्तगीकोभूलगए
ख़ुदा-परस्तख़ुदासतोलौलगातेरहे
ख़ुदाकीशानमगरआदमीकोभूलगए
वोजिसकेग़मनेग़म-ए-ज़िंदगीदियाहै'ज़फ़र'
उसीकेग़ममेंग़म-ए-ज़िंदगीकोभूलगए
  - Ahmad Zafar
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