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Jaun Elia
ham vo hain jo KHuda ko bhool ga.e
ham vo hain jo KHuda ko bhool ga.e | हम वो हैं जो ख़ुदा को भूल गए
- Jaun Elia
हम
वो
हैं
जो
ख़ुदा
को
भूल
गए
तुम
मेरी
जान
किस
गुमान
में
हो
- Jaun Elia
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कितनी
सराहत
से
ख़ुदा
ने
की
तिरी
कारीगरी
शफ़्फ़ाफ़
शीशे
को
तराशा,
हूर
का
पैकर
दिया
Aditya Pandey
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गुनाहगार
को
इतना
पता
तो
होता
है
जहाँ
कोई
नहीं
होता
ख़ुदा
तो
होता
है
Waseem Barelvi
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ख़ुदा
ख़ुदको
समझते
हो
तो
समझो
मगर
इक
रोज़
मर
जाना
है
तुमको
Shakeel Azmi
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थे
ख़ुदा
को
मानने
वाले
बड़ी
तादाद
में
है
तअज्जुब
पर
ख़ुदा
की
मानता
कोई
न
था
Rao Nasir
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बाक़ी
न
दिल
में
कोई
भी
या
रब
हवस
रहे
चौदह
बरस
के
सिन
में
वो
लाखों
बरस
रहे
Ameer Minai
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बना
कर
हमने
दुनिया
को
जहन्नुम
ख़ुदा
का
काम
आसाँ
कर
दिया
है
Rajesh Reddy
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वो
बे-वफ़ा
है
तो
क्या
मत
कहो
बुरा
उसको
कि
जो
हुआ
सो
हुआ
ख़ुश
रखे
ख़ुदा
उसको
Naseer Turabi
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ख़ुदा
ने
फ़न
दिया
हमको
कि
लड़के
इश्क़
लिखेंगे
ख़ुदा
कब
जानता
था
हम,
ग़ज़ल
में
दर्द
भर
देंगे
Prashant Sharma Daraz
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किया
तबाह
तो
दिल्ली
ने
भी
बहुत
'बिस्मिल'
मगर
ख़ुदा
की
क़सम
लखनऊ
ने
लूट
लिया
Bismil Saeedi
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हमारा
इश्क़
इबादत
का
अगला
दर्जा
है
ख़ुदा
ने
छोड़
दिया
तो
तुम्हारा
नाम
लिया
ग़मों
से
बैर
था
सो
हमने
ख़ुद-कुशी
कर
ली
शजर
ने
गिर
के
परिंदों
से
इन्तेक़ाम
लिया
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Balmohan Pandey
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चाँद
ने
ओढ़
ली
है
चादर-ए-अब्र
अब
वो
कपड़े
बदल
रही
होगी
Jaun Elia
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अब
नहीं
कोई
बात
ख़तरे
की
अब
सभी
को
सभी
से
ख़तरा
है
Jaun Elia
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हैं
बाशिंदे
उसी
बस्ती
के
हम
भी
सो
ख़ुद
पर
भी
भरोसा
क्यूँ
करें
हम
Jaun Elia
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किस
से
इज़हार-ए-मुद्दआ
कीजे
आप
मिलते
नहीं
हैं
क्या
कीजे
हो
न
पाया
ये
फ़ैसला
अब
तक
आप
कीजे
तो
क्या
किया
कीजे
आप
थे
जिस
के
चारा-गर
वो
जवाँ
सख़्त
बीमार
है
दु'आ
कीजे
एक
ही
फ़न
तो
हम
ने
सीखा
है
जिस
से
मिलिए
उसे
ख़फ़ा
कीजे
है
तक़ाज़ा
मिरी
तबीअ'त
का
हर
किसी
को
चराग़-पा
कीजे
है
तो
बारे
ये
आलम-ए-असबाब
बे-सबब
चीख़ने
लगा
कीजे
आज
हम
क्या
गिला
करें
उस
से
गिला-ए-तंगी-ए-क़बा
कीजे
नुत्क़
हैवान
पर
गराँ
है
अभी
गुफ़्तुगू
कम
से
कम
किया
कीजे
हज़रत-ए-ज़ुल्फ़-ए-ग़ालिया-अफ़्शाँ
नाम
अपना
सबा
सबा
कीजे
ज़िंदगी
का
अजब
मोआ'मला
है
एक
लम्हे
में
फ़ैसला
कीजे
मुझ
को
आदत
है
रूठ
जाने
की
आप
मुझ
को
मना
लिया
कीजे
मिलते
रहिए
इसी
तपाक
के
साथ
बे-वफ़ाई
की
इंतिहा
कीजे
कोहकन
को
है
ख़ुद-कुशी
ख़्वाहिश
शाह-बानो
से
इल्तिजा
कीजे
मुझ
से
कहती
थीं
वो
शराब
आँखें
आप
वो
ज़हर
मत
पिया
कीजे
रंग
हर
रंग
में
है
दाद-तलब
ख़ून
थूकूँ
तो
वाह-वा
कीजे
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Jaun Elia
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अपनी
मंज़िल
का
रास्ता
भेजो
जान
हम
को
वहाँ
बुला
भेजो
क्या
हमारा
नहीं
रहा
सावन
ज़ुल्फ़
याँ
भी
कोई
घटा
भेजो
नई
कलियाँ
जो
अब
खिली
हैं
वहाँ
उन
की
ख़ुश्बू
को
इक
ज़रा
भेजो
हम
न
जीते
हैं
और
न
मरते
हैं
दर्द
भेजो
न
तुम
दवा
भेजो
धूल
उड़ती
है
जो
उस
आँगन
में
उस
को
भेजो
सबा
सबा
भेजो
ऐ
फकीरो
गली
के
उस
गुल
की
तुम
हमें
अपनी
ख़ाक-ए-पा
भेजो
शफ़क़-ए-शाम-ए-हिज्र
के
हाथों
अपनी
उतरी
हुई
क़बा
भेजो
कुछ
तो
रिश्ता
है
तुम
से
कम-बख़्तों
कुछ
नहीं
कोई
बद-दुआ'
भेजो
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Jaun Elia
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