bikhar na ja kahii KHud ko mirii panaah men rakh | बिखर न जा कहीं ख़ुद को मिरी पनाह में रख

  - Ahmad Musharraf Khawar
बिखरजाकहींख़ुदकोमिरीपनाहमेंरख
हैंतुंद-ओ-तेज़जोदरियामिरीनिगाहमेंरख
झुकेसरयेकिसीआस्ताँपेतेरेसिवा
तोवोग़ुरूर-ओ-अनाअपनेकज-कुलाहमेंरख
येकबकहाकिमोहब्बतसेबाज़रहलेकिन
पलटकेभीसकेरास्तानिगाहमेंरख
फ़रेब-ए-नफ़्ससेमहफ़ूज़तोहोज़ातमिरी
कहींतोख़ौफ़कोईलज़्ज़त-ए-गुनाहमेंरख
रहेगाबाज़कहाँदिलभलामोहब्बतसे
परएकहर्फ़-ए-तसल्लीतोइंतिबाहमेंरख
मुक़ाबलातोअलगबातहैहवाओंसे
जलाकेएकदियाकोईपहलेराहमेंरख
असीरहूँकहींदाम-ए-हिर्स-ओ-दुनियाका
हमाराशौक़-ए-तलबअपनीबारगाहमेंरख
छुपेहैंकर्बहज़ारोंइसइकतबस्सुममें
गुलोंकीचाहजोकरख़ारभीनिगाहमेंरख
अभीख़बरहीकहाँतुझकोसोज़-ए-दिलक्याहै
तोक़हक़होंकोअभीरूहकीकराहमेंरख
यहीउजालेकभीछीनलेंगेबीनाई
ज़रासाशौक़अँधेरोंकाभीनिगाहमेंरख
  - Ahmad Musharraf Khawar
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