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Farhat Abbas Shah
bekar khayaalon se lipt kar nahin dekha
bekar khayaalon se lipt kar nahin dekha | बेकार ख़यालों से लिपटकर नहीं देखा
- Farhat Abbas Shah
बेकार
ख़यालों
से
लिपटकर
नहीं
देखा
जो
कुछ
भी
हुआ
हम
ने
पलटकर
नहीं
देखा
इस
डर
से
के
कट
जाए
न
बीनाई
के
रेशे
आँखों
ने
तेरी
राहों
से
हटकर
नहीं
देखा
- Farhat Abbas Shah
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तेरे
दर
से
जब
उठ
के
जाना
पड़ेगा
ख़ुद
अपना
जनाज़ा
उठाना
पड़ेगा
Khumar Barabankvi
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तमाम
शहर
को
तारीकियों
से
शिकवा
है
मगर
चराग़
की
बैअत
से
ख़ौफ़
आता
है
Aziz Nabeel
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मुझे
अब
तुम
से
डर
लगने
लगा
है
तुम्हें
मुझ
से
मोहब्बत
हो
गई
क्या
Jaun Elia
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कुछ
न
था
मेरे
पास
खोने
को
तुम
मिले
हो
तो
डर
गया
हूँ
मैं
Nomaan Shauque
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दिल
को
तेरी
चाहत
पे
भरोसा
भी
बहुत
है
और
तुझ
से
बिछड़
जाने
का
डर
भी
नहीं
जाता
Ahmad Faraz
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मुझे
ये
डर
है
तेरी
आरज़ू
न
मिट
जाए
बहुत
दिनों
से
तबीअत
मिरी
उदास
नहीं
Nasir Kazmi
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परिंद
क्यूँँ
मिरी
शाख़ों
से
ख़ौफ़
खाते
हैं
कि
इक
दरख़्त
हूँ
और
साया-दार
मैं
भी
हूँ
Asad Badayuni
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हमारे
जैसा
कोई
दर-ब-दर
नहीं
होगा
कहीं
पे
होगा
भी
तो
इस
कदर
नहीं
होगा
निकल
गया
हूँ
क़ज़ा
के
परे
तो
मैं
कबका
दे
जहर
भी
कोई
तो
अब
असर
नहीं
होगा
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Aadi Ratnam
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पहले
सौ
बार
इधर
और
उधर
देखा
है
तब
कहीं
डर
के
तुम्हें
एक
नज़र
देखा
है
Majrooh Sultanpuri
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इस
ख़ौफ़
में
कि
ख़ुद
न
भटक
जाएँ
राह
में
भटके
हुओं
को
राह
दिखाता
नहीं
कोई
Anwar Taban
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सफ़र
के
लाख
हीले
हैं
ये
दरिया
तो
वसीले
हैं
कहाँ
से
हो
के
आई
है
हवा
के
हाथ
पीले
हैं
डसा
है
हिज्र
ने
हम
को
हमारे
साँस
नीले
हैं
ख़ुदाया
ख़ुश्क
रुत
में
भी
हमारे
नैन
गीले
हैं
मैं
शाइ'र
हूँ
मोहब्बत
का
मिरे
दुख
भी
रसीले
हैं
अभी
तो
जंग
जारी
है
मगर
आ'साब
ढीले
हैं
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Farhat Abbas Shah
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उस
के
बारे
में
बहुत
सोचता
हूँ
मुझ
से
बिछड़ा
तो
किधर
जाएगा
Farhat Abbas Shah
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हिज्र
की
रात
छोड़
जाती
है
नित-नई
बात
छोड़
जाती
है
इश्क़
चलता
है
ता-अबद
लेकिन
ज़िंदगी
साथ
छोड़
जाती
है
दिल
बयाबानी
साथ
रखता
है
आँख
बरसात
छोड़
जाती
है
चाह
की
इक
ख़ुसूसियत
है
कि
ये
मुस्तक़िल
मात
छोड़
जाती
है
मरहले
इस
तरह
के
भी
हैं
कि
जब
ज़ात
को
ज़ात
छोड़
जाती
है
हिज्र
का
कोई
ना
कोई
पहलू
हर
मुलाक़ात
छोड़
जाती
है
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Farhat Abbas Shah
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इक
यही
रौशनी
रौशनी
इम्कान
में
है
तू
अभी
तक
दिल-ए-वीरान
में
है
शोर
बरपा
है
तिरी
यादों
का
रौनक़-ए-हिज्र
बयाबान
में
है
प्यार
और
ज़िंदगी
से
लगता
है
कोई
ज़िंदा-दिली
बे-जान
में
है
आज
भी
तेरे
बदन
की
ख़ुश्बू
तेरे
भेजे
हुए
गुल-दान
में
है
ज़िंदगी
भी
है
मिरी
आँखों
में
मौत
भी
दीदा-ए-हैरान
में
है
दिल
अभी
निकला
नहीं
सीने
से
एक
क़ैदी
अभी
ज़िंदान
में
है
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Farhat Abbas Shah
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इसी
से
जान
गया
मैं
कि
बख़्त
ढलने
लगे
मैं
थक
के
छाँव
में
बैठा
तो
पेड़
चलने
लगे
मैं
दे
रहा
था
सहारे
तो
इक
हुजूम
में
था
जो
गिर
पड़ा
तो
सभी
रास्ता
बदलने
लगे
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Farhat Abbas Shah
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