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Afzal Sultanpuri
mile kaise ha
mile kaise ha | मिले कैसे हमें जब ये मुक़द्दर नहीं है
- Afzal Sultanpuri
मिले
कैसे
हमें
जब
ये
मुक़द्दर
नहीं
है
बहुत
हाज़त
रही
लेकिन
मुयस्सर
नहीं
है
- Afzal Sultanpuri
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अब
उसकी
शादी
का
क़िस्सा
न
छेड़ो
बस
इतना
कह
दो
कैसी
लग
रही
थी
Zubair Ali Tabish
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल
तो
जुस्तुजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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उन
रस
भरी
आँखों
में
हया
खेल
रही
है
दो
ज़हर
के
प्यालों
में
क़ज़ा
खेल
रही
है
Akhtar Shirani
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जिसकी
ख़ातिर
कितनी
रातें
सुलगाई
जिसके
दुख
में
दिल
जाने
क्यूँ
रोता
है
इक
दिन
हम
सेे
पूछ
रही
थी
वो
लड़की
प्यार
में
कोई
पागल
कैसे
होता
है
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Ritesh Rajwada
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सफ़र
हालाँकि
तेरे
साथ
अच्छा
चल
रहा
है
बराबर
से
मगर
एक
और
रास्ता
चल
रहा
है
Shariq Kaifi
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मुझे
एक
लाश
कहकर
न
बहाओ
पानियों
में
मेरा
हाथ
छू
के
देखो
मेरी
नब्ज़
चल
रही
है
Azm Shakri
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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वो
अजब
शख़्स
था
हर
हाल
में
ख़ुश
रहता
था
उस
ने
ता-उम्र
किया
हँस
के
सफ़र
बारिश
में
Sahiba sheharyaar
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जिस
मौसम
में
भीगना
है
हम
दोनों
को
उस
मौसम
में
पूछ
रही
हो
छाता
है
Zubair Alam
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वो
आँखें
चुप
थीं
लेकिन
हँस
रही
थीं
मेरा
जी
कर
रहा
था
चूम
लूँ
अब
Ritesh Rajwada
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हर
बात
है
वही
पर
मतलब
बदल
गए
हैं
पहले
नहीं
थे
ऐसे
वो
अब
बदल
गए
हैं
इक
दिन
वो
बोल
बैठी
हो
बेवक़ूफ़
कितने
उम्मीद
क्यूँ
लगाई
जब
सब
बदल
गए
हैं
हो
हम
मुनाफ़िक़ों
को
कैसे
नसीब
मोमिन
दोनों
उसी
ख़ुदा
के
पर
रब
बदल
गए
हैं
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Afzal Sultanpuri
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पढ़ा
था
जो
किताबों
में
वही
सब
कुछ
हुआ
भी
है
बहुत
ढूंँढा
नहीं
पाया
कहीं
पर
तो
ख़ुदा
भी
है
नहीं
मिलता
पता
था
ये
मगर
दिल
की
रही
ख़्वाहिश
मिले
मुझको
कहीं
पर
तो
कहूँँ
कोई
फ़िदा
भी
है
दु'आ
में
भी
तुम्हें
मांँगा
इबादत
में
किया
गिर्या
मोहब्बत
है
अगर
नुक़सान
तो
इस
में
नफ़ा
भी
है
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Afzal Sultanpuri
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सारे
ख़्वाब
उसी
के
थे
मेरी
तो
बस
आँखें
थीं
मुझ
में
सुब्ह
उसी
से
थे
पहले
अँधेरी
रातें
थी
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Afzal Sultanpuri
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तेरे
दर
पर
सवाली
आ
गया
है
मगर
ये
हाथ
ख़ाली
आ
गया
है
Afzal Sultanpuri
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पहले
पहल
तो
पहला
था
उस
शख़्स
के
लिए
फिर
यूँँ
हुआ
कि
उसने
मुझे
दूसरा
किया
Afzal Sultanpuri
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