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Afzal Sultanpuri
saare KHvaab usii ke the
saare KHvaab usii ke the | सारे ख़्वाब उसी के थे
- Afzal Sultanpuri
सारे
ख़्वाब
उसी
के
थे
मेरी
तो
बस
आँखें
थीं
मुझ
में
सुब्ह
उसी
से
थे
पहले
अँधेरी
रातें
थी
- Afzal Sultanpuri
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जब
बुलंदी
का
गुमाँ
था
तो
नहीं
याद
आई
अपनी
परवाज़
से
टूटे
तो
ज़मीं
याद
आई
वही
आँखें
कि
जो
ईमान-शिकन
आँखें
हैं
उन्हीं
आँखों
की
हमें
दावत-ए-दीं
याद
आई
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Subhan Asad
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घूमता
रहता
है
हर
वक़्त
मेरी
आँखों
में
एक
चेहरा
जो
कई
साल
से
देखा
भी
नहीं
Riyaz Tariq
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मैं
हर
शख़्स
के
चेहरे
को
बस
इस
उम्मीद
से
तकता
हूँ
शायद
से
मुझको
दो
आँखें
तेरे
जैसी
दिख
जाएँ
Siddharth Saaz
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नदी
आँखें
भँवर
ज़ुल्फ़ें
कहाँ
तैरूँ
कहाँ
डूबूँ
कि
तेरे
शहर
में
सब
की
अदाएँ
एक
जैसी
हैं
Divyansh "Dard" Akbarabadi
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तुम्हारे
पास
आते
हैं
तो
साँसें
भीग
जाती
हैं
मोहब्बत
इतनी
मिलती
है
कि
आँखें
भीग
जाती
हैं
तबस्सुम
इत्र
जैसा
है
हँसी
बरसात
जैसी
है
वो
जब
भी
बात
करती
है
तो
बातें
भीग
जाती
हैं
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Aalok Shrivastav
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मुक़ाबिल
फ़ासलों
से
ही
मोहब्बत
डूब
जाएगी
सुनोगी
झूठी
बातें
तुम
हक़ीक़त
डूब
जाएगी
चलेगी
तब
तलक
जब
तक
तिरी
परछाईं
देखेगी
तिरा
जब
हुस्न
देखेगी
सियासत
डूब
जाएगी
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Anurag Pandey
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एक
चेहरा
है
जो
आँखों
में
बसा
रहता
है
इक
तसव्वुर
है
जो
तन्हा
नहीं
होने
देता
Javed Naseemi
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मुमकिन
है
कि
सदियों
भी
नज़र
आए
न
सूरज
इस
बार
अँधेरा
मिरे
अंदर
से
उठा
है
Aanis Moin
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लाखों
सद
में
ढेरों
ग़म
फिर
भी
नहीं
हैं
आँखें
नम
इक
मुद्दत
से
रोए
नहीं
क्या
पत्थर
के
हो
गए
हम
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Azm Shakri
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भूलभुलैया
था
उन
ज़ुल्फ़ों
में
लेकिन
हमको
उस
में
अपनी
राहें
दिखती
थीं
आपकी
आँखों
को
देखा
तो
इल्म
हुआ
क्यूँँ
अर्जुन
को
केवल
आँखें
दिखती
थीं
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Ashraf Jahangeer
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अफ़ज़ल
गुनाह
करते
हुए
डर
नहीं
गए
बेशर्म
हो
गए
हो
मगर
मर
नहीं
गए
कल
शाम
ये
ख़बर
मिली
हम
फ़ौत
हो
गए
मय्यत
उठाने
अपनी
भी
हम
घर
नहीं
गए
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Afzal Sultanpuri
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चाल
चलती
थी
वो
छुपाते
हुए
शर्म
आई
नहीं
बताते
हुए
मर
गया
एक
शख़्स
पीछे
ही
मुड़के
देखी
नहीं
वो
जाते
हुए
एक
लड़का
समझ
नहीं
पाया
मर
गया
वो
भी
ज़हर
खाते
हुए
आख़िरी
बार
मुझ
सेे
मिल
लेना
इश्क़
अपना
मगर
निभाते
हुए
ख़ूब
थी
उसकी
यार
अंगड़ाई
ख़ूब
लगती
थी
ज़ुल्म
ढाते
हुए
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Afzal Sultanpuri
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छोड़कर
तुम
जा
रहे
हो
ठीक
है
यार
तुम
तड़पा
रहे
हो
ठीक
है
सामने
तो
कह
दिया
था
कुछ
नहीं
आग
ख़ुद
दहका
रहे
हो
ठीक
है
था
बुलाया
काम
पर
तुम
थे
कहाँ
तुम
उसे
भड़का
रहे
हो
ठीक
है
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Afzal Sultanpuri
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अभी
तलवार
के
सब
घाव
रहने
दे
लगा
मरहम
नहीं
अब
घाव
रहने
दे
Afzal Sultanpuri
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बंदा
जब
बद-हवा
से
हो
जाए
इश्क़
फिर
बे-लिबास
हो
जाए
डर
के
मारे
ही
मर
वो
जाएगा
मौत
जब
आस
पास
हो
जाए
आरज़ू
है
तुम्हारा
साथ
मिले
क्या
ही
पूरी
ये
आस
हो
जाए
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Afzal Sultanpuri
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