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Afzal Sultanpuri
padha tha jo kitaabon men vahii sab kuchh hua bhi hai
padha tha jo kitaabon men vahii sab kuchh hua bhi hai | पढ़ा था जो किताबों में वही सब कुछ हुआ भी है
- Afzal Sultanpuri
पढ़ा
था
जो
किताबों
में
वही
सब
कुछ
हुआ
भी
है
बहुत
ढूंँढा
नहीं
पाया
कहीं
पर
तो
ख़ुदा
भी
है
नहीं
मिलता
पता
था
ये
मगर
दिल
की
रही
ख़्वाहिश
मिले
मुझको
कहीं
पर
तो
कहूँँ
कोई
फ़िदा
भी
है
दु'आ
में
भी
तुम्हें
मांँगा
इबादत
में
किया
गिर्या
मोहब्बत
है
अगर
नुक़सान
तो
इस
में
नफ़ा
भी
है
- Afzal Sultanpuri
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मुहब्बत
में
हमने
सियासत
न
की
तभी
इश्क़
में
कोई
बरकत
न
की
उसे
मानता
था
मैं
अपना
ख़ुदा
कभी
उसकी
लेकिन
इबादत
न
की
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RAJAT AWASTHI
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तिरे
लबों
में
मिरे
यार
ज़ाइक़ा
नहीं
है
हज़ार
बोसे
हैं
उन
पर
प
इक
दु'आ
नहीं
है
Pallav Mishra
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कौन
देकर
गया
दु'आ
दिल
को
उम्र
भर
दर्द
ही
रहा
दिल
को
दस्तकें
दे
रहा
है
कुछ
दिन
से
हम
सेे
क्या
काम
पड़
गया
दिल
को
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Subhan Asad
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गुज़िश्ता
साल
कोई
मस्लहत
रही
होगी
गुज़िश्ता
साल
के
सुख
अब
के
साल
दे
मौला
Liyaqat Ali Aasim
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दो
मुल्कों
के
सियासी
खेल
में
जाने
यहाँ
पर
कितनों
के
घर
उजड़े
हैं
मौला
वही
हर
सुब्ह
मंज़र
देखना
पड़ता
हज़ारों
लोग
यूँँ
ही
मरते
हैं
मौला
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Harsh saxena
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लोग
जिस
हाल
में
मरने
की
दु'आ
करते
हैं
मैं
ने
उस
हाल
में
जीने
की
क़सम
खाई
है
Ameer Qazalbash
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मैं
नज़र
से
पी
रहा
था
तो
ये
दिल
ने
बद-दुआ
दी
तिरा
हाथ
ज़िंदगी
भर
कभी
जाम
तक
न
पहुँचे
Shakeel Badayuni
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कितने
हसीं
हो
माशा-अल्लाह
तुम
पे
मोहब्बत
ख़ूब
जचेगी
Zubair Ali Tabish
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उठते
नहीं
हैं
अब
तो
दु'आ
के
लिए
भी
हाथ
किस
दर्जा
ना-उमीद
हैं
परवरदिगार
से
Akhtar Shirani
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ईद
के
रोज़
यही
अपनी
दु'आ
है
रब
से
मुल्क
में
अमन
का,
उलफ़त
का
बसेरा
हो
जाए
हर
परेशानी
से
हर
शख़्स
को
मिल
जाए
नजात
इस
सियह
रात
का
बस
जल्द
सवेरा
हो
जाए
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Zaki Azmi
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प्यार
मेरा
ख़रीद
लेगा
वो
यार
उसका
अमीर
है
मुर्शिद
Afzal Sultanpuri
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उसका
लहजा
गुलाब
जैसा
है
नींद
में
वो
तो
ख़्वाब
जैसा
है
Afzal Sultanpuri
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अभी
वो
लौटकर
आया
नहीं
काबे
कि
ज़ानिब
से
मिला
था
गांँव
के
हद
पर
करी
बातें
कवाकिब
से
Afzal Sultanpuri
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बनेगी
वो
अगर
राधा
हमारी
चलेगी
ज़िंदगी
ज़्यादा
हमारी
Afzal Sultanpuri
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ज़मीं
पर
जब
हुकूमत
हो
रही
थी
रिसालत
की
क़यादत
हो
रही
थी
नफ़ा
नुकसान
समझा
जा
रहा
है
मोहब्बत
में
तिजारत
हो
रही
थी
सफ़र
होता
मुकम्मल
किस
तरह
से
मुसलसल
जब
ख़िलाफ़त
हो
रही
थी
क़बीला
लुट
गया
कोई
न
आया
कहाँ
थे
जब
अज़ीयत
हो
रही
थी
लगा
के
आग
ख़ुश
शैतान
इतना
कहा
मेरी
हिमायत
हो
रही
थी
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Afzal Sultanpuri
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