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Afzal Sultanpuri
tere dar par sawaali aa gaya hai
tere dar par sawaali aa gaya hai | तेरे दर पर सवाली आ गया है
- Afzal Sultanpuri
तेरे
दर
पर
सवाली
आ
गया
है
मगर
ये
हाथ
ख़ाली
आ
गया
है
- Afzal Sultanpuri
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मुझे
ये
डर
है
तेरी
आरज़ू
न
मिट
जाए
बहुत
दिनों
से
तबीअत
मिरी
उदास
नहीं
Nasir Kazmi
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और
हुआ
भी
ठीक
वो
ही
जिसका
डर
था
बोझ
इतना
रख
दिया
था
बुलबुले
पर
Siddharth Saaz
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ख़ुदा,
फ़रिश्ते,
पयम्बर,
बशर
किसी
का
नहीं
मुझे
लिहाज़
तो
सबका
है
डर
किसी
का
नहीं
Charagh Sharma
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उसे
ज़ियादा
ज़रूरत
थी
घर
बसाने
की
वो
आ
के
मेरे
दर-ओ-बाम
ले
गया
मुझ
से
Farhat Abbas Shah
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बात
करो
रूठे
यारों
से
सन्नाटों
से
डर
जाते
हैं
प्यार
अकेला
जी
लेता
है
दोस्त
अकेले
मर
जाते
हैं
Kumar Vishwas
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पहले
सौ
बार
इधर
और
उधर
देखा
है
तब
कहीं
डर
के
तुम्हें
एक
नज़र
देखा
है
Majrooh Sultanpuri
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डर
मुझे
मेरी
मुहब्बत
एक
दिन
खो
जाएगी
यार
मुझको
लग
रहा
वो
ग़ैर
की
हो
जाएगी
मैं
सभी
वादे
पुराने
ही
निभाते
जाऊँगा
और
वो
जाकर
किसी
की
बाँह
में
सो
जाएगी
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Ravi 'VEER'
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रुके
रुके
से
क़दम
रुक
के
बार
बार
चले
क़रार
दे
के
तिरे
दर
से
बे-क़रार
चले
Gulzar
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डर
हम
को
भी
लगता
है
रस्ते
के
सन्नाटे
से
लेकिन
एक
सफ़र
पर
ऐ
दिल
अब
जाना
तो
होगा
Javed Akhtar
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हमीं
को
क़ातिल
कहेगी
दुनिया
हमारा
ही
क़त्ल-ए-आम
होगा
हमीं
कुएँ
खोदते
फिरेंगे
हमीं
पे
पानी
हराम
होगा
अगर
यही
ज़ेहनियत
रही
तो
मुझे
ये
डर
है
कि
इस
सदी
में
न
कोई
अब्दुल
हमीद
होगा
न
कोई
अब्दुल
कलाम
होगा
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Meraj Faizabadi
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यही
दुख
हमको
खाए
जा
रहा
है
वो
हमको
बिन
बताए
जा
रहा
है
मगर
उसने
ज़रा
भी
ये
न
सोचा
वो
हम
पर
ज़ुल्म
ढाए
जा
रहा
है
हम
उसको
याद
करने
में
लगे
हैं
वो
हमको
ही
भुलाए
जा
रहा
है
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Afzal Sultanpuri
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उन
को
लगता
है
सब
तमाशा
है
वो
मोहब्बत
जो
बे-तहाशा
है
Afzal Sultanpuri
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हमें
अब
इश्क़
में
पड़ना
नहीं
है
ख़ुदारा
जंग
ये
लड़ना
नहीं
है
तुम्हारे
ख़्वाब
से
तंग
आ
गए
हैं
हमें
अब
ख़्वाब
में
सड़ना
नहीं
है
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Afzal Sultanpuri
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मुसलसल
दर
पे
आने
लग
रहे
हैं
तिरे
दर
के
दीवाने
लग
रहे
हैं
मिरे
मुर्शिद
सुनो
अरदास
मेरी
कि
मुर्शिद
सब
सताने
लग
रहे
हैं
कहाँ
जाऊँ
रहूँगा
किस
जगह
मैं
मुझे
पागल
चिढ़ाने
लग
रहे
हैं
तुम्हारी
आँख
है
याक़ूत
जैसी
मुझे
क़लमा
पढ़ाने
लग
रहे
हैं
मुसल्ले
पर
खड़ा
होना
है
मुश्किल
क़दम
ये
डगमगाने
लग
रहे
हैं
कि
मैंने
कह
दिया
बस
जोड़
देना
सभी
मिलकर
घटाने
लग
रहे
हैं
चमकते
चाँद
पर
है
दाग़
कैसा
किसे
डर
कर
छुपाने
लग
रहे
हैं
कभी
अफ़ज़ल
हमारी
बात
सुनता
कि
दुश्मन
के
निशाने
लग
रहे
हैं
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Afzal Sultanpuri
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मोहब्बत
देखकर
मेरी
जहाँ
भी
ये
पिघल
जाए
तुम्हारी
याद
आई
तो
मेरे
आँसू
निकल
आए
Afzal Sultanpuri
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