kabhi na KHud ko bad-andesh-e-dast-o-dar rakha | कभी न ख़ुद को बद-अंदेश-ए-दश्त-ओ-दर रक्खा

  - Afzal Ahmad Syed
कभीख़ुदकोबद-अंदेश-ए-दश्त-ओ-दररक्खा
उतरकेचाहमेंपातालकासफ़ररक्खा
यहीबहुतथेमुझेनानआबशम्अगुल
सफ़र-नज़ादथाअस्बाबमुख़्तसररक्खा
हवा-ए-शाम-ए-दिल-आज़ारकोअसीरकिया
औरउसकोदश्तमेंपन-चक्कियोंकेघररक्खा
वोएकरेग-गज़ीदासीनहरचलनेलगी
जोमैंनेचूमकेपैकाँकमानपररक्खा
वोआईऔरवहींताक़चोंमेंफूलरखे
जोमैंनेनज़्रकेपत्थरपेजानवररक्खा
जबींकेज़ख़्मपेमिस्क़ाल-ए-ख़ाकरक्खीऔर
इकअलविदाकाशुगूँउसकेहाथपररक्खा
गिरफ़्ततेज़रक्खीरख़्श-ए-उम्रपरमैंने
बजाएजुम्बिश-ए-महमेज़-ए-नीश्तररक्खा
  - Afzal Ahmad Syed
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