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Pratap Somvanshi
safar men jab nikal aa.e ho to itni shikaayat kyuuñ
safar men jab nikal aa.e ho to itni shikaayat kyuuñ | सफ़र में जब निकल आए हो तो इतनी शिकायत क्यूँ
- Pratap Somvanshi
सफ़र
में
जब
निकल
आए
हो
तो
इतनी
शिकायत
क्यूँ
सड़क
थोड़ी
बहुत
तो
बीच
में
तिरछी
निकलती
है
- Pratap Somvanshi
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किताब
फ़िल्म
सफ़र
इश्क़
शा'इरी
औरत
कहाँ
कहाँ
न
गया
ख़ुद
को
ढूँढता
हुआ
मैं
Jawwad Sheikh
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मैं
अपने
आप
में
गहरा
उतर
गया
शायद
मिरे
सफ़र
से
अलग
हो
गई
रवानी
मिरी
Abbas Tabish
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वक़्त
देता
था
वो
मिलने
का
तभी
रक्खी
थी
दोस्त
इक
दौर
था
मैंने
भी
घड़ी
रक्खी
थी
रास्ता
ख़त्म
मकानों
के
तजावुज़
से
हुआ
मैंने
जब
नक़्शा
बनाया
था
गली
रक्खी
थी
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Nadir Ariz
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डर
हम
को
भी
लगता
है
रस्ते
के
सन्नाटे
से
लेकिन
एक
सफ़र
पर
ऐ
दिल
अब
जाना
तो
होगा
Javed Akhtar
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धोखा
है
इक
फ़रेब
है
मंज़िल
का
हर
ख़याल
सच
पूछिए
तो
सारा
सफ़र
वापसी
का
है
Rajesh Reddy
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सिवा
इसके
कुछ
अच्छा
ही
नहीं
लगता
है
शामों
में
सफ़र
कैसा
भी
हो
घर
को
परिंदे
लौट
जाते
हैं
Aarush Sarkaar
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जो
भी
होना
था
हो
गया
छोड़ो
अब
मैं
चलता
हूँ
रास्ता
छोड़ो
अब
तो
दुनिया
भी
देख
ली
तुमने
अब
तो
ख़्वाबों
को
देखना
छोड़ो
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Vikram Sharma
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ज़िंदगी
यूँँ
हुई
बसर
तन्हा
क़ाफ़िला
साथ
और
सफ़र
तन्हा
Gulzar
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रास्ता
भूल
के
आ
निकले
हैं
हम
तेरे
लोग
नहीं
थे
दुनिया
Ashraf Yousafi
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न
मंज़िलों
को
न
हम
रहगुज़र
को
देखते
हैं
अजब
सफ़र
है
कि
बस
हम-सफ़र
को
देखते
हैं
Ahmad Faraz
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लक्ष्मण-रेखा
भी
आख़िर
क्या
कर
लेगी
सारे
रावण
घर
के
अंदर
निकलेंगे
Pratap Somvanshi
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ज़ेहनियत
को
साफ़
रखना
सीखिए
लड़कियाँ
यूँँ
भी
तो
हँसती-बोलती
हैं
Pratap Somvanshi
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हिम्मत,
ताकत,
प्यार,
भरोसा
जो
है
सब
इनसे
ही
है
कुछ
नंबर
हैं
जिन
पर
मैंने
अक्सर
फोन
लगाया
है
Pratap Somvanshi
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राम
तुम्हारे
युग
का
रावन
अच्छा
था
दस
के
दस
चेहरे
सब
बाहर
रखता
था
Pratap Somvanshi
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आ
जाए
कौन
कब
कहाँ
कैसी
ख़बर
के
साथ
अपने
ही
घर
में
बैठा
हुआ
हूँ
मैं
डर
के
साथ
Pratap Somvanshi
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