naslein jo andhere ke mahaazo_n pe ladi hain | नस्लें जो अँधेरे के महाज़ों पे लड़ी हैं

  - Aftab Iqbal Shamim
नस्लेंजोअँधेरेकेमहाज़ोंपेलड़ीहैं
अबदिनकेकटहरेमेंख़ता-वारखड़ीहैं
बे-नामसीआवाज़-ए-शगुफ़्तआईकहींसे
कुछपतियाँशायदशजर-ए-शबसेझड़ीहैं
निकलेंतोशिकस्तोंकेअँधेरेउबलआएँ
रहनेदोजोकिरनेंमिरीआँखोंमेंगड़ीहैं
डूब!उभरनाहैतुझेअगलेनगरमें
मंज़िलभीबुलातीहैसलीबेंभीखड़ीहैं
जबपासकभीजाएँतोपटभेड़लेंखटसे
क्यालड़कियाँसपनेकेदरीचोंमेंखड़ीहैं
क्यारातकेआशोबमेंवोख़ुदसेलड़ाथा
आईनेकेचेहरेपेख़राशेंसीपड़ीहैं
ख़ामोशियाँउससाहिल-ए-आवाज़सेआगे
पातालसेगहरीहैं,समुंदरसेबड़ीहैं
  - Aftab Iqbal Shamim
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