mohabbat men ranj-o-alam maangte hain | मोहब्बत में रंज-ओ-अलम माँगते हैं

  - Prashant Kumar
मोहब्बतमेंरंज-ओ-अलममाँगतेहैं
मिरेसाथअगलाजनममाँगतेहैं
कभीमंदिरोंमेंकभीमस्जिदोंमें
ख़ुदासवोमुझसासनममाँगतेहैं
मोहब्बतकरूँँहरजनममेंउन्हींसे
वोमुझसेेबसइतनाकरममाँगतेहैं
अगरहाथउठाएँतोहरदमदु'आमें
वोख़ुशियाँमुझेख़ुदकोग़ममाँगतेहैं
वोमहफ़िलमेंख़ामोशदेखेंकभीतो
इशारोंइशारोंमेंग़ममाँगतेहैं
लबोंपरमिरेमुस्कुराहटकादरिया
परअपनेलिएचश्म-ए-नममाँगतेहैं
उन्हींकाबनूँहरजनममेंख़ुदास
बसइतनाहीअहल-ए-करममाँगतेहैं
क़यामतकभीहमनेदेखीनहींसो
तुम्हारीकमरकेहीख़ममाँगतेहैं
  - Prashant Kumar
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy