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Aatish Indori
qais-o-laila ka zamaana yuñ to deewaana hai
qais-o-laila ka zamaana yuñ to deewaana hai | क़ैस-ओ-लैला का ज़माना यूँँ तो दीवाना है
- Aatish Indori
क़ैस-ओ-लैला
का
ज़माना
यूँँ
तो
दीवाना
है
पर
मोहब्बत
पे
बड़ी
सख़्ती
है
जुर्माना
है
- Aatish Indori
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घिरौंदा
रौशनी
से
तर
नहीं
है
किसी
दरवेश
का
ये
दर
नहीं
है
तुम्हारी
तरह
आख़िर
बन
गया
हूँ
जो
कुछ
अंदर
है
वो
बाहर
नहीं
है
मेरी
तस्वीर
में
सब
रंग
भर
दो
मेरा
दिल
दिल
ही
है
पत्थर
नहीं
है
लहू
में
घुल
गया
है
इश्क़
आतिश
दिल-ए-नादाँ
ठिकाने
पर
नहीं
है
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याद
आ
जाती
है
और
रात
बिगड़
जाती
है
बनने
वाली
थी
जो
वो
बात
बिगड़
जाती
है
याद
रखना
कि
बुरा
होता
है
मुँह-फट
होना
ज़िंदगी
भर
के
लिए
बात
बिगड़
जाती
है
सोचते
यह
हैं
कि
ता-उम्र
रहेंगे
मिल
के
वक़्त
के
साथ
मगर
बात
बिगड़
जाती
है
यह
कोई
पहली
दफ़ा
थोड़ी
हुआ
है
जानाँ
हर
दफ़ा
मेरी
बनी
बात
बिगड़
जाती
है
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जश्न
की
वजह
यार
देता
हूँ
हौसला
हूँ
बहार
देता
हूँ
हाँ
तेरा
इंतिज़ार
कर
लूँगा
यूँँ
ही
घंटों
गुज़ार
देता
हूँ
जब
भी
तन्हा
हो
तो
चले
आना
वक़्त
अपना
उधार
देता
हूँ
जिस्म
तक
बात
रखनी
है
ओके
तो
मुखौटा
उतार
देता
हूँ
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यहाँ
मूढ़ों
का
अब
सम्मान
थोड़ी
है
पुराने
वाला
हिंदुस्तान
थोड़ी
है
सुख़नवर
हो
मगर
एसा
लब-ओ-लहजा
वतन
है
जंग
का
मैदान
थोड़ी
है
लब-ओ-लहजे
ने
ज़ाहिर
कर
दी
सच्चाई
मुहब्बत
का
तो
यह
एलान
थोड़ी
है
ज़रूरी
चीज़
है
हो
दिल
में
मानवता
बिना
इसके
कोई
इंसान
थोड़ी
है
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बसेरा
और
कहीं
पर
डाल
लो
जानाँ
मेरे
दिल
में
पिशाचों
का
बसेरा
है
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