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Aatish Indori
yaad aa jaati hai aur raat bigad jaati hai
yaad aa jaati hai aur raat bigad jaati hai | याद आ जाती है और रात बिगड़ जाती है
- Aatish Indori
याद
आ
जाती
है
और
रात
बिगड़
जाती
है
बनने
वाली
थी
जो
वो
बात
बिगड़
जाती
है
याद
रखना
कि
बुरा
होता
है
मुँह-फट
होना
ज़िंदगी
भर
के
लिए
बात
बिगड़
जाती
है
सोचते
यह
हैं
कि
ता-उम्र
रहेंगे
मिल
के
वक़्त
के
साथ
मगर
बात
बिगड़
जाती
है
यह
कोई
पहली
दफ़ा
थोड़ी
हुआ
है
जानाँ
हर
दफ़ा
मेरी
बनी
बात
बिगड़
जाती
है
- Aatish Indori
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बड़ी
मुश्किल
से
नीचे
बैठते
हैं
जो
तेरे
साथ
उठते
बैठते
हैं
Khurram Afaq
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चलो
न
फिर
से
दरिया
के
नज़दीक
चलें
चलो
न
फिर
से
डुबकी
साथ
लगाएँगे
Atul K Rai
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अच्छा
है
दिल
के
साथ
रहे
पासबान-ए-अक़्ल
लेकिन
कभी
कभी
इसे
तन्हा
भी
छोड़
दे
Allama Iqbal
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आप
के
बाद
हर
घड़ी
हम
ने
आप
के
साथ
ही
गुज़ारी
है
Gulzar
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तेरे
साथ
भी
मुश्किल
पड़ता
था
तेरे
बिन
तो
गुजारा
क्या
होता
गर
तू
भी
नहीं
होता
तो
न
जाने
दोस्त
हमारा
क्या
होता
Siddharth Saaz
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जो
मेरे
साथ
मोहब्बत
में
हुई
आदमी
एक
दफा
सोचेगा
रात
इस
डर
में
गुजारी
हमने
कोई
देखेगा
तो
क्या
सोचेगा
Tehzeeb Hafi
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शर्तें
लगाई
जाती
नहीं
दोस्ती
के
साथ
कीजे
मुझे
क़ुबूल
मिरी
हर
कमी
के
साथ
Waseem Barelvi
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ज़रा
पाने
की
चाहत
में
बहुत
कुछ
छूट
जाता
है
नदी
का
साथ
देता
हूँ
समुंदर
रूठ
जाता
है
Aalok Shrivastav
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मशवरा
हम
भी
तो
दे
सकते
थे
पर
तेरा
साथ
दे
रहे
थे
हम
Vishal Singh Tabish
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एक
काटा
राम
ने
सीता
के
साथ
दूसरा
वनवास
मेरे
नाम
पर
Nasir Shahzad
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आग
है
पर
धुआँ
नहीं
होता
दिल
में
क्या
है
बयाँ
नहीं
होता
एक
दुनिया
वहाँ
बसानी
है
शख़्स
तन्हा
जहाँ
नहीं
होता
या
तो
बचपन
है
या
बुढ़ापा
है
बोन्साई
जवाँ
नहीं
होता
दरमियाँ
कोई
फिर
भी
होता
है
कोई
जब
दरमियाँ
नहीं
होता
भीड़
में
हूँ
तो
क्या
हुआ
'आतिश'
शख़्स
तन्हा
कहाँ
नहीं
होता
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Aatish Indori
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शाम
को
रोज़
बुलंदी
से
उतर
आते
हैं
जो
परिंदे
हैं
वो
तो
लौट
के
घर
आते
हैं
उम्र
भर
साथ
निभाने
को
कोई
कहता
है
तब
मुहब्बत
में
अगर
और
मगर
आते
हैं
उनको
व्यापार
ही
व्यापार
नज़र
आता
है
लोग
जो
जिस्म
की
गलियों
से
गुज़र
आते
हैं
बे-वफ़ाओं
की
बताता
हूँ
अनूठी
पहचान
वे
ज़ियादा
ही
वफ़ादार
नज़र
आते
हैं
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Aatish Indori
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दूर
रहिए
मेरी
कहानी
से
आप
गुज़रे
नहीं
जवानी
से
हम
भी
निकलेंगे
इस
कहानी
से
आप
गर
निकले
ज़िंदगानी
से
आप
पार्टी
नहीं
हो
मुंसिफ़
हो
फिर
भी
रोकोगे
सच-बयानी
से
यूँँ
इधर
से
उधर
न
भटकाओ
तुम
कहानी
कहो
रवानी
से
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Aatish Indori
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अलग
हूँ
सब
से
पर
कम-तर
नहीं
हूँ
दिलों
में
हूँ
कोई
बे-घर
नहीं
हूँ
मेरी
तौहीन
तुम
कैसे
करोगे
मैं
कब
से
जिस्म
के
अंदर
नहीं
हूँ
हमारा
साथ
इक
संयोग
हैं
बस
सफ़र
में
हूँ
मैं
भी
रहबर
नहीं
हूँ
रहूँगा
सामने
आँखों
के
हर-दम
गुज़र
जाए
जो
वो
मंज़र
नहीं
हूँ
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Aatish Indori
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बसेरा
और
कहीं
पर
डाल
लो
जानाँ
मेरे
दिल
में
पिशाचों
का
बसेरा
है
Aatish Indori
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